1. हमारे मित्र कुमार अमित सिंह द्वारा किए गए Facebook में पोस्टों पर उनके कुछ मित्रों द्वारा उठाए गए सवालों पर जब वह व्यथित थे तब हमने उनका यह जवाब अपना लिखा - - -
अमित जी जब हम धरती में भी चलते हैं तो धरती में हमारे पदचाप गूंजते हैं । जब हम कुछ करेंगे या कहेंगे तो दूसरे लोग उस पर तो अपनी टिप्पणी करेगे ही करेगे । कोशिश तो हमको भी यही करनी पड़ती है लेकिन इन्हीं शब्दों को जब हम अर्थ अच्छे से जोड़ लेते हैं तो अच्छे हो जाते हैं बुरे से जोड़ लेते हैं तो बुरे हो महसूस हो जाते हैं। हां किसी में जाति-धर्म का जवाब कुछ ना कुछ बना रहता है तो हो सकता है कि उसका पुट आ जाये । वैसे मुझे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता चाहे जैसा लिखो मैं तो अपने धुन में अपनी जैसी लिखता रहता हूं । अपने स्टैंड पर कायम रहना भी अपने आप में एक कला है यदि यह स्टैंड केवल दिखावटी है तो फिर दिक्कत तो होती ही होती है । मैं तो विगत 7 -8 वर्षों से आपके आस-पास हूं मैंने तो कभी कोई शिकायत नहीं की, क्योंकि विचार अपने अपने मन की उपज होते हैं । जब हम इनको दूसरों के अनुरूप ढालने की कोशिश करते हैं तभी गलतियां प्रकट होने लगती हैं । जय, जय, जय !
2. दिनेश गंगवाल जी द्वारा "अटल जी" की अंत्येष्टि के बाद एक पोस्ट द्वारा लोगों को उनके अनुसरण करने की सलाह दी गई थी । नीचे देखें उसका हमारा उत्तर--
इंसान है, इंसान को हमेशा अपने ही तौर तरीकों से जीना चाहिए। जो तरीके मानव उपयोगी हो, दूसरे को नुकसान व ठेस न पहुंचाते हो, इंसानियत को प्रसन्न करने वाले हो, और हमको खुद अपने मन में स्वीकार और पसन्द हो, ऐसे तोर-तरीके हमारे होने चाहिए न कि किसी दूसरे के तौर-तरीकों पर अमल करना चाहिए, न करने की शिक्षा देना चाहिए । हर इंसान की समझ पर एक शरीरिक और वातावरण अलग-अलग होता है। उसी के अनुसार हमें अपने कार्य करने चाहिए। जब हम अपने आप से कुछ करते हैं तो वह भी समाज को अलग दिखाई पड़ता है और एक उदाहरण बन जाता है ।
इस पर राज बलम प्रसाद जी द्वारा कुछ आपत्ति उठाई गई थी। उस पर हमने अपना मत प्रस्तुत किया -
राज बलम प्रसाद जी,
इसमें अच्छे बुरे की कोई बात नहीं है । विचार मस्तिष्क से पैदा होते हैं इन को दूसरे के समकक्ष अनुकूल कैसे किया जा सकता है। आदमी छोटा हो या बड़ा हर इंसान के कुछ कार्य अच्छे हो या बुरा हुआ करते हैं। जो अच्छे हैं वह स्वीकार कर लेना चाहिए और जो बुरे हैं उन को त्याग कर देना चाहिए। यदि लोग पिछलों से ही सीखते रहते तो आज इतने शिक्षित और आगे नहीं बढ़ते । कोई भी व्यक्ति विचार किसी के कहने से न तो स्वीकार करता है और न ही उनका त्याग करता है । मानव सुलभ बात है जो कार्य उसको करने में साधारण और रुचिकारक लगता है उसको अपनाता चला जाता है । कठिन और कठिनाई का सामना केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही लोग किया करते हैं या फिर मजबूरी मे या शारीरिक आर्थिक दबाव में ।
- राम बलम प्रसाद जी द्वारा पुनः सवाल उठाए जाने पर हमने कहा कि-- राम बलम प्रसाद जी, धन्यवाद। आप हमें समझ नहीं रहे हो। किसी के कहने से कोई विचार कभी लादता नहीं है और वह अपने आप बन के पसंद व्यक्ति का अनुकरण करता रहता है।
यह वाकई मानव के मन की बात भी होती है कि वह अपने ही इच्छा के अनुरूप काम करना चाहता है, न कि किसी के जबरदस्त दबाव से या प्रभाव से । यदि इसी पसंदगी में विकल्प रखा जाए कि यदि तुम्हें पसंद हो तो तो ऐसा या वैसा कार्य करो । आज कोई भी व्यक्ति न तो अपने लीख से हटकर कोई कार्य करना चाहता है और न ही अपनी सोच और स्तर को घटिया देखना चाहता है, तो भला क्यों ना आदमी के मर्जी पर ही छोड़ दिया जाए कि वह किस का अनुसरण करें या किसी का न करे ॥
विनोद सचान
अमित जी जब हम धरती में भी चलते हैं तो धरती में हमारे पदचाप गूंजते हैं । जब हम कुछ करेंगे या कहेंगे तो दूसरे लोग उस पर तो अपनी टिप्पणी करेगे ही करेगे । कोशिश तो हमको भी यही करनी पड़ती है लेकिन इन्हीं शब्दों को जब हम अर्थ अच्छे से जोड़ लेते हैं तो अच्छे हो जाते हैं बुरे से जोड़ लेते हैं तो बुरे हो महसूस हो जाते हैं। हां किसी में जाति-धर्म का जवाब कुछ ना कुछ बना रहता है तो हो सकता है कि उसका पुट आ जाये । वैसे मुझे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता चाहे जैसा लिखो मैं तो अपने धुन में अपनी जैसी लिखता रहता हूं । अपने स्टैंड पर कायम रहना भी अपने आप में एक कला है यदि यह स्टैंड केवल दिखावटी है तो फिर दिक्कत तो होती ही होती है । मैं तो विगत 7 -8 वर्षों से आपके आस-पास हूं मैंने तो कभी कोई शिकायत नहीं की, क्योंकि विचार अपने अपने मन की उपज होते हैं । जब हम इनको दूसरों के अनुरूप ढालने की कोशिश करते हैं तभी गलतियां प्रकट होने लगती हैं । जय, जय, जय !
2. दिनेश गंगवाल जी द्वारा "अटल जी" की अंत्येष्टि के बाद एक पोस्ट द्वारा लोगों को उनके अनुसरण करने की सलाह दी गई थी । नीचे देखें उसका हमारा उत्तर--
इंसान है, इंसान को हमेशा अपने ही तौर तरीकों से जीना चाहिए। जो तरीके मानव उपयोगी हो, दूसरे को नुकसान व ठेस न पहुंचाते हो, इंसानियत को प्रसन्न करने वाले हो, और हमको खुद अपने मन में स्वीकार और पसन्द हो, ऐसे तोर-तरीके हमारे होने चाहिए न कि किसी दूसरे के तौर-तरीकों पर अमल करना चाहिए, न करने की शिक्षा देना चाहिए । हर इंसान की समझ पर एक शरीरिक और वातावरण अलग-अलग होता है। उसी के अनुसार हमें अपने कार्य करने चाहिए। जब हम अपने आप से कुछ करते हैं तो वह भी समाज को अलग दिखाई पड़ता है और एक उदाहरण बन जाता है ।
इस पर राज बलम प्रसाद जी द्वारा कुछ आपत्ति उठाई गई थी। उस पर हमने अपना मत प्रस्तुत किया -
राज बलम प्रसाद जी,
इसमें अच्छे बुरे की कोई बात नहीं है । विचार मस्तिष्क से पैदा होते हैं इन को दूसरे के समकक्ष अनुकूल कैसे किया जा सकता है। आदमी छोटा हो या बड़ा हर इंसान के कुछ कार्य अच्छे हो या बुरा हुआ करते हैं। जो अच्छे हैं वह स्वीकार कर लेना चाहिए और जो बुरे हैं उन को त्याग कर देना चाहिए। यदि लोग पिछलों से ही सीखते रहते तो आज इतने शिक्षित और आगे नहीं बढ़ते । कोई भी व्यक्ति विचार किसी के कहने से न तो स्वीकार करता है और न ही उनका त्याग करता है । मानव सुलभ बात है जो कार्य उसको करने में साधारण और रुचिकारक लगता है उसको अपनाता चला जाता है । कठिन और कठिनाई का सामना केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही लोग किया करते हैं या फिर मजबूरी मे या शारीरिक आर्थिक दबाव में ।
- राम बलम प्रसाद जी द्वारा पुनः सवाल उठाए जाने पर हमने कहा कि-- राम बलम प्रसाद जी, धन्यवाद। आप हमें समझ नहीं रहे हो। किसी के कहने से कोई विचार कभी लादता नहीं है और वह अपने आप बन के पसंद व्यक्ति का अनुकरण करता रहता है।
यह वाकई मानव के मन की बात भी होती है कि वह अपने ही इच्छा के अनुरूप काम करना चाहता है, न कि किसी के जबरदस्त दबाव से या प्रभाव से । यदि इसी पसंदगी में विकल्प रखा जाए कि यदि तुम्हें पसंद हो तो तो ऐसा या वैसा कार्य करो । आज कोई भी व्यक्ति न तो अपने लीख से हटकर कोई कार्य करना चाहता है और न ही अपनी सोच और स्तर को घटिया देखना चाहता है, तो भला क्यों ना आदमी के मर्जी पर ही छोड़ दिया जाए कि वह किस का अनुसरण करें या किसी का न करे ॥
विनोद सचान