कितना अजीब लगता है कि लोग अब बोलने भी नहीं देते किसी को I लोगों को अपने हार का प्रलाप भी नहीं करने देते हैं। जाहिर सी बात होती है कि जब भी आदमी अंदर से घायल होता है या कोई उसे आंतरिक तकलीफ होती है तो उसे मानसिक रूप से संतुलित होने के लिए कुछ अपने विचार प्रकट करने पड़ते हैं और कुछ दूसरों के सुनने पड़ते हैं। चूकि जब अंदर भरे हुए अपनी बातों को वह प्रकट नहीं कर लेता, तब तक उसको आत्मिक संतोष नहीं मिलता है। जब कभी वह दो चार लोगों के बीच में बैठेगा और जो उन्हें अपने लगेंगे तो उनसे अपनी व्यथा को या अपने आंतरिक कष्ट को व्यक्त करेगा।
अभी हाल में ही लोकतंत्र के लोकसभा के सदस्य पद के चुनाव कराए गए। लड़ने वाले बहुत होते हैं। उनमें से कुछ अच्छी पार्टी के होते हैं, कुछ खराब पार्टी के होते हैं या कुछ धनाढय पार्टी के होते हैं तो कोई निर्धन पार्टी को होते हैं। तमाम तो उनमें निर्दलीय होते हैं। जिनका कोई गल नहीं होता है जो अपने को प्रदर्शित करते हैं। इस बार लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेश और गठबंधन (यानी सपा और बसपा दोनों मिलकर) के प्रत्याशियों बीच था।
चुनाव हुआ। जनता ने अपने वोटों का इस्तेमाल करके जिसे चाहा, उसको जिताने के क्रम में कार्य किया। जनता ने चुना या किसी और ढंग से चुना गया। मतगणना जब हुई तो पूरे देश से भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। क्योंकि पहले से ही भारतीय जनता पार्टी के दोनों नेता गठबंधन को बुरी तरीके से निशाना बनाए हुए थे और घबरा ऐसा रहे थे। तमाम नागरिक यदि भाजपा के साथ था तो गठबंधन के साथ भी कम नहीं था। किंतु भारी बहुमत से जीत होने के कारण लोगों के दिमाग में कुछ न कुछ तो आना ही था और हारने वालों को भी अपने होने वाली जीत से बिछड़ कर, कुछ न कुछ तो प्रलाप करना ही था।
भारतीय जनता पार्टी बहुमत से देश में जीती। स्थानीय संसद सदस्य की सीट से भी भाजपा का ही प्रत्याशी भारी अंतर से जीता। भारतीय जनता के बाद दूसरे नंबर पर गठबंधन का ही प्रत्याशी था। प्रदेश की बहुतायत संसद सदस्य क्षेत्रों में गठबंधन का ही प्रत्याशी दूसरी पंक्ति पर खड़ा नजर आया है। तीसरे नंबर पर आने वाले प्रत्याशी को ज्यादा माथापच्ची नहीं करना होता है और न ही ज्यादा जवाब देना होता है। पब्लिक देख लेती है और शांत हो जाती है, कुछ सवाल भी नहीं करती है। लेकिन दूसरे नंबर पर गठबंधन के प्रत्याशी को उनके पदाधिकारियों को और उनके समर्थकों को आपस में चर्चा करनी ही पड़ती है। वैसे तो जीते हुए दल भाजपा के लोग भी चर्चा करेंगे तो गठबंधन की ही करेंगे। बात करने के लिए कुछ ना कुछ तो मुद्दों को सहारे के लिए किसी को चुनना होगा। इस बार के चुनाव में अधिकतर ईवीएम ही निसाने पर रही।
वोट पड़ने के पहले भी ईवीएम के संबंध में चुनाव आयोग को कई बार विपक्षी दलों द्वारा एक होकर के हटाने के लिए कहा गया था। लेकिन चुनाव आयोग द्वारा इनके आवेदन को नकार दिया गया और तब यह सभी दल मिलकर के भारत के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट गए। वहां से भी कोई वाजिब सहयोग नहीं मिल सका। सहयोग न मिलने के कारण अब चुनाव आयोग की मर्जी थी तो चुनाव आयोग ने ईवीएम के द्वारा ही वोट कराएं। चुनाव होने के बाद प्रदेश में कई जगह प्राइवेट वाहनों में ईवीएम का पाया जाना जनता के मन में भ्रम को भरने लगा। कई प्रत्याशी तो ईवीएम की रक्षा के लिए दो-तीन रात गिनती स्थल पर डटे रहे।
हारे हुए लोग अब अपने हारने का दोष जनता को तो दे नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि हमारा वोट हमको मिला है। अब बात करने के लिए बचता है तो केवल यही कहा जा सकता है कि कुछ तो था तो कुछ नही, ईवीएम हीं आती है। हम लोग ही भी हमको तरह तरह से दोष देने लगे। लेकिन दूसरे लोगों को यह सुनना भी गवारा नहीं हो रहा था। आप कहीं भी बात करो तो दूसरे समूह के लोग जिन्होंने भाजपा को समर्थन दिया है वह लोग उसका विरोध तुरंत करने लगते हैं।
वोटिंग की गणना के बाद बस में यात्रा कर रहे लोग और बस का परिचालक भी गठबंधन का समर्थक होने के कारण लगातार अपने कन्नौज क्षेत्र से संपर्क बनाए हुआ था। बस परिचालक द्वारा यह पूछने पर कि यहां पर किसकी जीत हुई है तो एक सहयात्री में मोदी के समर्थन और बहुमत की बात करते हुए बताया कि यहां से देवेंद्र सिंह भोले की जीत हुई है। उधर कन्नौज की सीट में उलझे हुए परिचालक ने अपना मत जाहिर करते हुए कहा कि जरूर कुछ न कुछ बेईमानी की गई है, तभी यह जीत हासिल हुई है। अब फिर बात आई तो दोष इवीएम पर ही दिया गया। भाई अब इस समय इस चुनाव में विश्लेषण में केवल और केवल ईवीएम ही ऐसी है जिस पर दोष डाल करके पूरी जिम्मेदारी से बचा जा सकता है। ईवीएम को दोषी कहने पर भाजपा समर्थक यात्री के ऊपर पता नहीं क्या प्रक्रिया हुई, लगातार उसने बार-बार तेज आवाज मे ईवीएम के पक्ष मे बात करना शुरू कर दिया। बस में अब बिल्कुल शांति थी, न कोई हां कहने वाला था और न ही कोई न कहने वाला था। थोड़ी देर की बड़बड़ाहट के बाद वह ईवीएम के समर्थक सज्जन चुप हो गए।
अभी एक दिन पूर्व की ही तो बात है एक दुकान में फिर वही हार-जीत और समीक्षा की बात चल रही थी। फिर लोगों ने एर-घेर के दोष ईवीएम पर ही रखना शुरू कर दिया। अब तो ईवीएम के संबंध में मुझे भी कुछ कहना पड़ा और सभी लोगों ने एक सुर पर ईवीएम को दोष देना शुरू कर दिया। उन भाजपा पदाधिकारी महोदय से रहा नहीं गया और उन्होंने बीच में ही टोंक दिया और तमाम बात बताने लगे। बाद में से यही कहा गया आप शांत रहिए। बात चल रही है चलने दीजिए। आप सभी लोग चर्चा से विलग हो गए।
तो ऐसा लगा,
क्या लोग अब आप हो या हम हो या जनता को या इस देश के नागरिक को या सताए हुए लोगों को या दुखी हुए लोगों को---
क्या बात भी नहीं करने देंगे ?
क्या विचार-विमर्श भी नहीं करने देंगे ?
क्या सोचने भी नहीं देंगे ?
क्या समझने भी नहीं देंगे ?
ऐसा ही लोगों को कौन सा अधिकार है कि वह जबरदस्ती की बात करेंगे या किसी को बात नहीं करने देंगे ?
आखिर क्या लोग, इन लोगों के सामने बात अपनी जाहिर नहीं कर सकते ?
तमाम ऐसे सवाल हैं जो आज यह कह रहे हैं, ऐसा लगता है कि निरंकुशता का शासन आ गया है।
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