एसके सिंह ने यह कहा कि मैं मोदी जी की बुराई नहीं सुन सकता और बताया कि नोटबंदी, जीएसटी -आज कोई 56 इंच का सीने वाला व्यक्ति ही कर सकता है, ला सकता है।
उसी का जवाब में उनको दे रहा हूं । देखें और कोई कमी हो तो इंगित करें --
ठीक है, अपना विश्वास है, अपनी राय है, अपना मत है, लेकिन किसी दूसरे से यह अपेक्षा कर लेना कि नहीं जो मेरी सोच है, जो मैं कर रहा हूं या जिसके लिए कर रहा हूं, उसके लिए हमारे मित्र भी करें, तो ऐसा तो वही व्यक्ति कर सकता है, जो किसी के साथ मानसिक ज्यादती करेगा। जरूरी नहीं है कि जो हम सोच रहे हैं, वह सही है और सब के लिए सही है, अधिकतर तो होता यह है की आमजन की बात बहुत ही कम लोग करते हैं। जबकि सभी स्वार्थ पूर्ति हेतु कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं। तमाम लोग किसी नेता से जाति के कारण जुड़े हैं, तो तमाम लोग किसी नेता से अपने लाभ के कारण जुड़े हैं, तो तमाम लोग अपने किसी घर के व्यक्ति के कारण या किसी अन्य कारण से जुड़े हुए हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो देश के लिए किसी से जुड़ते हैं और देश के लिए करते हैं। आज अर्थ युग है हर व्यक्ति का यही दृष्टिकोण है कि किस प्रकार से हम ज्यादा से ज्यादा धन का अर्जन करें। भले ही वह उचित मार्ग से आए या अनुचित मार्ग से आए। तो संभव नहीं है कि जितनी आर्थिक स्थिति हमारी मजबूत है, इतनी सामने वाले की भी हो और वह हमारे साथ चल दे। अपना समय भी दे और अपना रोटी कमाने का समय जाया करें ऐसा संभव नहीं है।
इसीलिए अब नेताओं के पीछे चलने वालों लोगों की संख्या में कमी आती जा रही है।
रह गई बात नोटबंदी की तो इसको किसी भी दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार से सफल नहीं कहा जा सकता है इस नोटबंदी ने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया है और ना ही इस से कोई राष्ट्रीय राष्ट्र उपलब्धि प्राप्त हुई है बल्कि लचर और गंदे तरीके से इस योजना को लागू करने के कारण पल-पल में बल्ले नियम और बढ़ाएं गए समय से के कारण पूर्णरूपेण यह योजना भ्रष्टाचार के अधीन हो गई थी हां गरीब के घर का सदस्य पैसा निकल कर बैंक तक पहुंच गया और बदल गया इस योजना से ना तो किसी पूंजीपति और भ्रष्टाचारी का रुपया रुका मैंने जरूर ले ले देकर के तमाम तरीकों से इन सभी पूंजीपतियों का पूरा का पूरा बदल दिया था इससे दिक्कत उन गरीबों को हुई थी जिनको उस समय किसी दुर्घटना के कारण पैसे की आवश्यकता थी उनको अपना समय के साथ-साथ अपने पारिवारिक किसी का बेटा किसी की पत्नी तो किसी का पिता तो किसी का बाबा तो किसी का जाए किसी न किसी से उसको भी छोड़ना पड़ा था हर बैंकों में लंबी लाइन थी हर अस्पताल में पुराने नोट की जगह नए नोट की मांग की जा रही थी हर व्यक्ति आपूर्ति करने में सक्षम नहीं था आज भी जब रिजर्व बैंक यह कहता है कि 99% धन वापस आ गया तो फिर एक परसेंट तो पूरे देश विदेश में कहीं न कहीं यह मुद्रा छिपी रह सकती है इसलिए हम उसको किसी भी हालत में सफल और अच्छा नहीं कह सकते हैं
और अब जीएसटी में चलते हैं। जीएसटी भारत सरकार का कोई अच्छा कार्यक्रम नहीं रहा। आज भी इस देश में और अपने निवास प्रदेश, उत्तर प्रदेश में मैं सरेआम देख रहा हूं कि तमाम उत्पादन ऐसे हैं जिन पर जीएसटी अदा ही नहीं की जा रही है। जैसे कभी इस प्रदेश में सेल टैक्स हुआ करता था, सेल टेक्स के बाद वेट आया, तो यहां का व्यापारी भयभीत हो गया था। लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला था। वही ढाक के तीन पात, बगैर चोरी के इन प्रदेशों में तभी व्यवसाय नहीं चल सकता है और यह संभव ही नहीं है। जब तक कि सरकारें अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति न रखती हो, जीएसटी में भी केंद्र सरकार ने तमाम तरह के नियम बनाए। इसको इतना कठिन कर दिया कि व्यापारी हड़बड़ा गया। बाद में जीएसटी विभाग वाले ही हड़बड़ा गए और उन्होंने इस को ऐसा कर दिया कि वेट से भी गया गुजरा हो गया केवल कागज के नाम पर आप खानापूर्ति करनी है। खानापूर्ति के बाद फिर वही उगाही, अधिकारी आज भी चौराहे पर खड़े होकर के जीएसटी के नाम पर रात में लूटते हैं। परिणाम कुछ नहीं है जैसा चल रहा था, वैसा आज भी चल रहा है। तो जनता को कोई फायदा नहीं नजर आया हमको हां टैक्स बढ़ गए इसकी वजह से केंद्र सरकार के खजाने तक पैसा कुछ ज्यादा बढ़ गया तू इन योजनाओं से तब तक फायदा नहीं है। जब तक हम सही ढंग से उचित मानिटरिंग या मूल्यांकन से योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वन नहीं करेंगे, किसी भी योजना से सरकार को, या जनता को राहत मिलने वाली नहीं है। बल्कि इसी बीच में अधिकारी कर्मचारी अपनी तो बना लेता है और जनता पिसती रहती है।मेरे हिसाब से जीएसटी से जनता को कोई सहूलियत नहीं मिली है।
तो सही बात तो यही है कि जीएसटी की वजह से कुछ व्यापारी बीच में कमा खा जरूर रहे हैं। लेकिन जनता आज भी हैरान और परेशान है।
सीना 56 इंच यह बात भी कुछ समझ में नहीं आती है। प्रदेश का कार्यालय हो या देश का कार्यालय हो, इसमें अगर देखें तो हर कदम पर बगैर पैसे का कोई काम नहीं हो रहा है। आज भी भ्रष्टाचार का कोई पुरसाहाल नहीं है। हर योजना में भ्रष्टाचार का पूर्ण रूप से बोलबाला है। आपने इन्हीं दो योजनाओं का उल्लेख किया था। मैंने इन्हीं दो योजनाओं का जैसा जनता की नजर में जो है, उसका उल्लेख किया है। मूल्यांकन करना आपका काम है और जो भी समझना या न समझना वह भी आपका काम है। लेकिन जनता भी मूल्यांकन करती है और उसी मूल्यांकन के आधार पर, उसने केंद्र में बदलाव किया था। यदि ऐसा ही सब कुछ चलेगा, और उसको कुछ अलग दिख नहीं रहा है, तो जनता भी मूल्यांकन करने को तैयार है।
रह गई बात, किसी बात के पसंद आने की, न आने की, तो सच तो हमेशा कड़वा होता है और यह पुराने समय से चला आ रहा है। यदि कहीं कुछ गड़बड़ चल रहा है और उसको हम संज्ञान में न ले करके केवल सब ठीक चल रहा है, तो हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। मै भी सरकार बनने के पूर्व मोदी जी के साथ था और आज साथ रह कर केन्द्र व राज्य सरकार को सचेत करने का कार्य कर रहा हूं।
अभी हाल में ही राफेल कंपनी के विमानों के निर्माण के लिए एच ए एल भारत सरकार की कंपनी है, उसे अयोग्य घोषित करके, अंबानी की कंपनी को काम दे दिया गया। इस संबंध में हमने पोस्ट किया कि "यदि भारत सरकार की एच ए एल कंपनी इतनी ही कमजोर है तो इसका अंबानी की कंपनी में कर दिया जाए और यह मोदी जी की एक बड़ी उपलब्धि होगी।
इस पर राज गंगवार जी कमेंट किया कि जानकारी के लिए धन्यवाद और कोशिश करें कि टाटा बिरला और सब कंपनियां बंद करवा दिया जाए।
इस संबंध में हमने राज गंगवार जी को नीचे लिखा हुआ जवाब प्रस्तुत किया ---
भारत सरकार की एच ए एल कंपनी काफी समय से कई प्रकार के विमानों का निर्माण करने का कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है। जिस समय राफेल विमानों का सौदा फ्रांस से किया गया था, तब यही बात थी कि एचएएल को ही राफेल विमान निर्माण के लिए अधिकृत किया जाएगा। फिलहाल देश में व्यक्तिगत कंपनी या सरकारी क्षेत्र की किसी भी कंपनी के पास इतना अनुभव नहीं है कि वह राफेल कंपनी का विमान को निर्माण की गति दे सके। जब सौदा परिपक्वता पर आया तो विभिन्न प्रकार के प्रयासों से सरकारी नीतियों के कारण राफेल विमान के निर्माण की जिम्मेदारी अंबानी के कंपनी को दे दी गई। फिर हाल अंबानी के कंपनी के पास विमान बनाने का कोई पुख्ता आधार और अनुभव नहीं है। इससे जाहिर है कि भारत सरकार द्वारा अनुभव और योग्यता को दरकिनार करते हुए जानबूझकर लाभ पहुंचाने के लिए एच ए एल के बजाय अंबानी की कंपनी का चयन किया गया। हाल में ही फ्रांस की मीडिया में भी राफेल का भारत से सौदा छाया रहा था। जिसकी थोड़ी बहुत गतिविधि भारत तक आ पहुंची थी। रह गई बात Tata की, Tata कंपनी अपने आप में बहुत ही धीर-गंभीर और सुनियोजित प्रणाम देने वाली कंपनी है। किंतु इधर देखा जा रहा है कि उसे किसी भी केंद्रीय योजना में किसी प्रकार का वरीयता नहीं मिल रही है वरीयता न मिलने के कुछ ठोस वजह भी होंगे और जाहिर सी बात है कि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण Tata कंपनी को बुलाया नही जा रहा है। अभी हाल में Tata कंपनी के रतन Tata जी ने मोहन भागवत के साथ मुलाकात की थी जहां पर यह महसूस हो रहा है की सत्ता के अभिन्न अंग कि मदद के बगैर शायद ही किसी कंपनियां या व्यक्ति का बढ़ना मुमकिन है। उन दूसरी कंपनियों की तो बात ही छोड़ दी जाए जिन्होंने मोटा चंदा पार्टी के साथ उसके आनुषंगिक संगठनों को साथ नहीं दिया है।
राज गंगवार जी, कंपनियां सरकार चलाएं या चलवाए यह सरकारी पैसा इन कंपनियों में लगाए तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं होगा। विभिन्न टैक्स के द्वारा जनताा से सरकार तक पहुंचा रुपैया का उचित प्रबंध न किया जाना, अपने आप में दुखदाई है। मौजूदा सरकार 4 साल से लगातार बैंकों को मजबूूूत कर रही है। कभी जनधन खातों में जनता सेेे पैसा डलवाा कर तो कभी बैंकों को जनता का पैसा देकर । आज भी बैंकों की हालत किसी से छिपी नहीं है। केवल यह कह कर के की बैंकिंग की विसंगतियां पूर्व सरकार की देन है देश हित मेंं इसको टाला नहीं जा सकता है।
जय भारत ! जय जय जय !
उसी का जवाब में उनको दे रहा हूं । देखें और कोई कमी हो तो इंगित करें --
ठीक है, अपना विश्वास है, अपनी राय है, अपना मत है, लेकिन किसी दूसरे से यह अपेक्षा कर लेना कि नहीं जो मेरी सोच है, जो मैं कर रहा हूं या जिसके लिए कर रहा हूं, उसके लिए हमारे मित्र भी करें, तो ऐसा तो वही व्यक्ति कर सकता है, जो किसी के साथ मानसिक ज्यादती करेगा। जरूरी नहीं है कि जो हम सोच रहे हैं, वह सही है और सब के लिए सही है, अधिकतर तो होता यह है की आमजन की बात बहुत ही कम लोग करते हैं। जबकि सभी स्वार्थ पूर्ति हेतु कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं। तमाम लोग किसी नेता से जाति के कारण जुड़े हैं, तो तमाम लोग किसी नेता से अपने लाभ के कारण जुड़े हैं, तो तमाम लोग अपने किसी घर के व्यक्ति के कारण या किसी अन्य कारण से जुड़े हुए हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो देश के लिए किसी से जुड़ते हैं और देश के लिए करते हैं। आज अर्थ युग है हर व्यक्ति का यही दृष्टिकोण है कि किस प्रकार से हम ज्यादा से ज्यादा धन का अर्जन करें। भले ही वह उचित मार्ग से आए या अनुचित मार्ग से आए। तो संभव नहीं है कि जितनी आर्थिक स्थिति हमारी मजबूत है, इतनी सामने वाले की भी हो और वह हमारे साथ चल दे। अपना समय भी दे और अपना रोटी कमाने का समय जाया करें ऐसा संभव नहीं है।
इसीलिए अब नेताओं के पीछे चलने वालों लोगों की संख्या में कमी आती जा रही है।
रह गई बात नोटबंदी की तो इसको किसी भी दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार से सफल नहीं कहा जा सकता है इस नोटबंदी ने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया है और ना ही इस से कोई राष्ट्रीय राष्ट्र उपलब्धि प्राप्त हुई है बल्कि लचर और गंदे तरीके से इस योजना को लागू करने के कारण पल-पल में बल्ले नियम और बढ़ाएं गए समय से के कारण पूर्णरूपेण यह योजना भ्रष्टाचार के अधीन हो गई थी हां गरीब के घर का सदस्य पैसा निकल कर बैंक तक पहुंच गया और बदल गया इस योजना से ना तो किसी पूंजीपति और भ्रष्टाचारी का रुपया रुका मैंने जरूर ले ले देकर के तमाम तरीकों से इन सभी पूंजीपतियों का पूरा का पूरा बदल दिया था इससे दिक्कत उन गरीबों को हुई थी जिनको उस समय किसी दुर्घटना के कारण पैसे की आवश्यकता थी उनको अपना समय के साथ-साथ अपने पारिवारिक किसी का बेटा किसी की पत्नी तो किसी का पिता तो किसी का बाबा तो किसी का जाए किसी न किसी से उसको भी छोड़ना पड़ा था हर बैंकों में लंबी लाइन थी हर अस्पताल में पुराने नोट की जगह नए नोट की मांग की जा रही थी हर व्यक्ति आपूर्ति करने में सक्षम नहीं था आज भी जब रिजर्व बैंक यह कहता है कि 99% धन वापस आ गया तो फिर एक परसेंट तो पूरे देश विदेश में कहीं न कहीं यह मुद्रा छिपी रह सकती है इसलिए हम उसको किसी भी हालत में सफल और अच्छा नहीं कह सकते हैं
और अब जीएसटी में चलते हैं। जीएसटी भारत सरकार का कोई अच्छा कार्यक्रम नहीं रहा। आज भी इस देश में और अपने निवास प्रदेश, उत्तर प्रदेश में मैं सरेआम देख रहा हूं कि तमाम उत्पादन ऐसे हैं जिन पर जीएसटी अदा ही नहीं की जा रही है। जैसे कभी इस प्रदेश में सेल टैक्स हुआ करता था, सेल टेक्स के बाद वेट आया, तो यहां का व्यापारी भयभीत हो गया था। लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला था। वही ढाक के तीन पात, बगैर चोरी के इन प्रदेशों में तभी व्यवसाय नहीं चल सकता है और यह संभव ही नहीं है। जब तक कि सरकारें अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति न रखती हो, जीएसटी में भी केंद्र सरकार ने तमाम तरह के नियम बनाए। इसको इतना कठिन कर दिया कि व्यापारी हड़बड़ा गया। बाद में जीएसटी विभाग वाले ही हड़बड़ा गए और उन्होंने इस को ऐसा कर दिया कि वेट से भी गया गुजरा हो गया केवल कागज के नाम पर आप खानापूर्ति करनी है। खानापूर्ति के बाद फिर वही उगाही, अधिकारी आज भी चौराहे पर खड़े होकर के जीएसटी के नाम पर रात में लूटते हैं। परिणाम कुछ नहीं है जैसा चल रहा था, वैसा आज भी चल रहा है। तो जनता को कोई फायदा नहीं नजर आया हमको हां टैक्स बढ़ गए इसकी वजह से केंद्र सरकार के खजाने तक पैसा कुछ ज्यादा बढ़ गया तू इन योजनाओं से तब तक फायदा नहीं है। जब तक हम सही ढंग से उचित मानिटरिंग या मूल्यांकन से योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वन नहीं करेंगे, किसी भी योजना से सरकार को, या जनता को राहत मिलने वाली नहीं है। बल्कि इसी बीच में अधिकारी कर्मचारी अपनी तो बना लेता है और जनता पिसती रहती है।मेरे हिसाब से जीएसटी से जनता को कोई सहूलियत नहीं मिली है।
तो सही बात तो यही है कि जीएसटी की वजह से कुछ व्यापारी बीच में कमा खा जरूर रहे हैं। लेकिन जनता आज भी हैरान और परेशान है।
सीना 56 इंच यह बात भी कुछ समझ में नहीं आती है। प्रदेश का कार्यालय हो या देश का कार्यालय हो, इसमें अगर देखें तो हर कदम पर बगैर पैसे का कोई काम नहीं हो रहा है। आज भी भ्रष्टाचार का कोई पुरसाहाल नहीं है। हर योजना में भ्रष्टाचार का पूर्ण रूप से बोलबाला है। आपने इन्हीं दो योजनाओं का उल्लेख किया था। मैंने इन्हीं दो योजनाओं का जैसा जनता की नजर में जो है, उसका उल्लेख किया है। मूल्यांकन करना आपका काम है और जो भी समझना या न समझना वह भी आपका काम है। लेकिन जनता भी मूल्यांकन करती है और उसी मूल्यांकन के आधार पर, उसने केंद्र में बदलाव किया था। यदि ऐसा ही सब कुछ चलेगा, और उसको कुछ अलग दिख नहीं रहा है, तो जनता भी मूल्यांकन करने को तैयार है।
रह गई बात, किसी बात के पसंद आने की, न आने की, तो सच तो हमेशा कड़वा होता है और यह पुराने समय से चला आ रहा है। यदि कहीं कुछ गड़बड़ चल रहा है और उसको हम संज्ञान में न ले करके केवल सब ठीक चल रहा है, तो हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। मै भी सरकार बनने के पूर्व मोदी जी के साथ था और आज साथ रह कर केन्द्र व राज्य सरकार को सचेत करने का कार्य कर रहा हूं।
अभी हाल में ही राफेल कंपनी के विमानों के निर्माण के लिए एच ए एल भारत सरकार की कंपनी है, उसे अयोग्य घोषित करके, अंबानी की कंपनी को काम दे दिया गया। इस संबंध में हमने पोस्ट किया कि "यदि भारत सरकार की एच ए एल कंपनी इतनी ही कमजोर है तो इसका अंबानी की कंपनी में कर दिया जाए और यह मोदी जी की एक बड़ी उपलब्धि होगी।
इस पर राज गंगवार जी कमेंट किया कि जानकारी के लिए धन्यवाद और कोशिश करें कि टाटा बिरला और सब कंपनियां बंद करवा दिया जाए।
इस संबंध में हमने राज गंगवार जी को नीचे लिखा हुआ जवाब प्रस्तुत किया ---
भारत सरकार की एच ए एल कंपनी काफी समय से कई प्रकार के विमानों का निर्माण करने का कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है। जिस समय राफेल विमानों का सौदा फ्रांस से किया गया था, तब यही बात थी कि एचएएल को ही राफेल विमान निर्माण के लिए अधिकृत किया जाएगा। फिलहाल देश में व्यक्तिगत कंपनी या सरकारी क्षेत्र की किसी भी कंपनी के पास इतना अनुभव नहीं है कि वह राफेल कंपनी का विमान को निर्माण की गति दे सके। जब सौदा परिपक्वता पर आया तो विभिन्न प्रकार के प्रयासों से सरकारी नीतियों के कारण राफेल विमान के निर्माण की जिम्मेदारी अंबानी के कंपनी को दे दी गई। फिर हाल अंबानी के कंपनी के पास विमान बनाने का कोई पुख्ता आधार और अनुभव नहीं है। इससे जाहिर है कि भारत सरकार द्वारा अनुभव और योग्यता को दरकिनार करते हुए जानबूझकर लाभ पहुंचाने के लिए एच ए एल के बजाय अंबानी की कंपनी का चयन किया गया। हाल में ही फ्रांस की मीडिया में भी राफेल का भारत से सौदा छाया रहा था। जिसकी थोड़ी बहुत गतिविधि भारत तक आ पहुंची थी। रह गई बात Tata की, Tata कंपनी अपने आप में बहुत ही धीर-गंभीर और सुनियोजित प्रणाम देने वाली कंपनी है। किंतु इधर देखा जा रहा है कि उसे किसी भी केंद्रीय योजना में किसी प्रकार का वरीयता नहीं मिल रही है वरीयता न मिलने के कुछ ठोस वजह भी होंगे और जाहिर सी बात है कि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण Tata कंपनी को बुलाया नही जा रहा है। अभी हाल में Tata कंपनी के रतन Tata जी ने मोहन भागवत के साथ मुलाकात की थी जहां पर यह महसूस हो रहा है की सत्ता के अभिन्न अंग कि मदद के बगैर शायद ही किसी कंपनियां या व्यक्ति का बढ़ना मुमकिन है। उन दूसरी कंपनियों की तो बात ही छोड़ दी जाए जिन्होंने मोटा चंदा पार्टी के साथ उसके आनुषंगिक संगठनों को साथ नहीं दिया है।
राज गंगवार जी, कंपनियां सरकार चलाएं या चलवाए यह सरकारी पैसा इन कंपनियों में लगाए तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं होगा। विभिन्न टैक्स के द्वारा जनताा से सरकार तक पहुंचा रुपैया का उचित प्रबंध न किया जाना, अपने आप में दुखदाई है। मौजूदा सरकार 4 साल से लगातार बैंकों को मजबूूूत कर रही है। कभी जनधन खातों में जनता सेेे पैसा डलवाा कर तो कभी बैंकों को जनता का पैसा देकर । आज भी बैंकों की हालत किसी से छिपी नहीं है। केवल यह कह कर के की बैंकिंग की विसंगतियां पूर्व सरकार की देन है देश हित मेंं इसको टाला नहीं जा सकता है।
जय भारत ! जय जय जय !
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