जम्मू कश्मीर की समस्या उठाने पर, इंद्रजीत सिंह जी ने कहा जब तक नेताओं को नोटा का भय नहीं होगा, तब तक ऐसे ही बेवकूफ बनाते रहेंगे जनता को ।
उनके इस नोटा के सवाल पर मैं उन्हें जवाब दे रहा हूं ---
इंद्रजीत सिंह जी, आप काफी दिन से नोटा के पक्ष में काफी अच्छा माहौल बना रहे हैं। हो सकता है कि यह आपके दृष्टि में महत्वपूर्ण या फिर यह कोई निर्णायक बिंदु हो, जो राजनीति में आपके अनुसार विभिन्न पहलुओं पर दबाव बनाकर, उनमें देश के प्रति कुछ जागृत हो। यहां पर कुछ का मतलब देश प्रेम या जनता प्रेम है या समस्या के निस्तारण से है या भ्रष्टाचार को समाप्त करने जैसा भाव से।
वर्तमान में राजनीति को जिस तरीके से तोड़ा मरोड़ा गया है उस का विकृत रूप आज सामने आया है जिसमें जनता को नेपथ्य में डालकर राजनैतिक जिसे जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाया था। उसनेे अपनी स्थित को मजबूत करते हुए प्रजातंत्रर को महत्त्व हीन कर दिया। ऐसेे लोगों को भला आप नोटा के माध्यम से क्या संदेश दे लेंगे।
इंद्रजीत सिंह जी पहले तो आप यह सोचें कि आपको नोटा की आवश्यकता क्यों पड़ी। नोटा का मौजूदा चुनाव में क्या असर पड़ेगा और नोटा से आपके पक्ष में या जनता के पक्ष में क्या निर्णय आएगा ??
इस नोटा के पूर्व आपके दिलो और दिमाग पर भाजपा का पूर्ण प्रभाव था। अभी हाल में ही कुछ संगठनों के साजिश केे द्वारा देश में अस्थिरता पैदा करने के लिए और चुनाव में अपनेेे लाभ के लिए एक नया जातीय संघर्ष प्रारंभ कर दिया गया। जातीय संघर्ष मे आप भी बखूबी कूद गए गए। एससी/एसटी एक्ट के संशोधन पर भाजपा सरकार की बखिया उधे लते हुए, आपने जो अपराध नहीं किया था, उसके लिए जांच और सजा की प्रक्रिया में बदलाव की मांग करने लगे। ठीक है , आप पहले से ही कुछ ऐसा करना चाहते है, जिसकी जांच और सजा से आपको भी डर महसूस हो रहा है। नितांत दबी कुचली जात जो आज भी संघर्ष करने की स्थिति में नहीं है। या आपके सामने खड़ी नहींं हो सकती है, भला उस में कहां दम है कि आप पर झूठा मुकदमा लिखा दे। आप ज्यादती कर नहीं रहे है, तो भावी अपराध पर दुनिया भर का बखेड़ा क्यों ?
चलो ठीक है, आप की इच्छा थी, आप की मर्जी थी, आपने अपने को ही समाज में, सवर्ण संगठन के रूप में अलग कर लिया। चलो यह भी अच्छा हुआ, आप तो उनसे ऐसे भी अलग थे, वैसे भी उनसे ऊपर थे, तो यह उनके लिए कोई नई बात नहीं हुई।
तभी यहीं से कुछ खुराफाती लोगों के दिमाग में एक नोटा वोट देने का आइडिया डेवलप हो गया। कुछ लोगों को तो अच्छा लग रहा होगा और उद्देश्यय बनाया गया होगा कि इसके आधार पर भय दिखाकर हम मौजूदा भाजपा सरकार से तो संसोधन करा ही लेंगे। लेकिन सरकार अपनी मजबूरी बस ऐसा नहीं कर सकी। नोटा मतलब हम ने वोट दिया, लेकिन किसी भी पक्ष में नहीं है या सभी प्रत्याशी अयोग्य हैं। प्राथमिक बात यही है कि जब हमको अपने मंतव्य यानी वोट को किसी के प्रति नहीं जुड़वाना है तो भला हम अपना समय बर्बाद करके अपने या किसी साधन के द्वारा मतदान केंद्र तक क्यों जाएंगे। यदि जाएंगे भी तो लंबी लाइन क्योंं लगाएंगे, यदि लगाएंगे भी तो वोट क्यों डालेंगे ? यानी फिर हमारी कोई रुचि नहीं होगी, कि हम मतदान केंद्र तक जाएं और अपना मत बेकार करके चलें आए। वोट पड़ गए, हमारे मत नोटा में पड़ गया। बाकी सभी पार्टियों को अपने अपने समर्थकोंं के वोट मिले। उनमें में हार-जीत हो गई। हमारी इच्छा थी कि फलाना जीते, लेकिन वह 2 वोट से हार गया और हमारे पास नोटा के 500 बूट आ गए। तब हमे पछतावा होगा न कि एक गलत और गंदा आदमी सत्ता में आ गया। यदि हम बहकावे में ना आते, तो कम से कम हमारे मतलब की सरकार होती, तो ऐसा न होता। देश के लिए कुछ करने वाला व्यक्ति को राजनीति में जनता का प्रतिनिधित्व कर रहा होता। लेकिन इसकेेेे बाद पछताने से कोई बात बननेे वाली है।
हां, हम उनके सामने यह छाती जरूर पीटे के कह सकते हैं कि यदि तुमने हमारी बात मान ली होती तो हम तुम को 2 वोट से जिता दिए होते और हमारे देश के विकास के स्वर्णिम 5 वर्ष यूं ही हवा में चले गए। अब भला नोटा क्या कर लेगा? जिस नेता को आप भी दिखाना चाहते हैं, तो वह चुनाव के बाद आपके लिए क्या कर लेगा। और आप जिस जनता को नोटा का हथियार समझ कर प्रयोग कर रहे हैं जब जनता इसका हाल जान जाएगी, तब आप पर विश्वास कैसे करेंगी। जनता का नुकसान तो आपकी वजह से, उसका वोट नोटा में जाने के कारण हुआ। आपने बहुत कहा बहुत समझाया और वह नेता जी आपके पीछे पड़ा तब आप ने तय किया कि चलो अगली बार हम आपको बनाते हैं। लेकिन आप अगली बार भी हार गए। क्योंकि दूसरे ने अच्छी मेहनत की और चुनाव जीत गया। आप हाथ मलते रह गए। देश गड्ढे में चला गया।
इसलिए मान्यवर मैं समझता हूं नोटा का उपयोग ना तो प्रजातंत्र के पक्ष में होगा। न ही जनता के पक्ष में होगा और न ही आपके पक्ष में होगा। मैं समझता हूं कि हम लोगों को ऐसे लोगों का चुनाव किया जाना चाहिए, जो हमारी बात को संसद मैं उठा सकता हो, जनता का प्रतिनिधि बनकर करके क्षेत्र में काम करे, न कि जनता का राजा।
हो सकता है विचारों का यह संचरण, आपस में मेल न खाए तो उसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए। इस पर कोई भी प्रतिष्ठा न लगाई जाए और न ही बुरा माना जाए। यह समझा जाए कि आपके लिए किसी ने भी कुछ लिखा ही नहीं है। कटुता का प्रभाव न हमके होना चाहिए, न आपको होना चाहिए ॥
उनके इस नोटा के सवाल पर मैं उन्हें जवाब दे रहा हूं ---
इंद्रजीत सिंह जी, आप काफी दिन से नोटा के पक्ष में काफी अच्छा माहौल बना रहे हैं। हो सकता है कि यह आपके दृष्टि में महत्वपूर्ण या फिर यह कोई निर्णायक बिंदु हो, जो राजनीति में आपके अनुसार विभिन्न पहलुओं पर दबाव बनाकर, उनमें देश के प्रति कुछ जागृत हो। यहां पर कुछ का मतलब देश प्रेम या जनता प्रेम है या समस्या के निस्तारण से है या भ्रष्टाचार को समाप्त करने जैसा भाव से।
वर्तमान में राजनीति को जिस तरीके से तोड़ा मरोड़ा गया है उस का विकृत रूप आज सामने आया है जिसमें जनता को नेपथ्य में डालकर राजनैतिक जिसे जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाया था। उसनेे अपनी स्थित को मजबूत करते हुए प्रजातंत्रर को महत्त्व हीन कर दिया। ऐसेे लोगों को भला आप नोटा के माध्यम से क्या संदेश दे लेंगे।
इंद्रजीत सिंह जी पहले तो आप यह सोचें कि आपको नोटा की आवश्यकता क्यों पड़ी। नोटा का मौजूदा चुनाव में क्या असर पड़ेगा और नोटा से आपके पक्ष में या जनता के पक्ष में क्या निर्णय आएगा ??
इस नोटा के पूर्व आपके दिलो और दिमाग पर भाजपा का पूर्ण प्रभाव था। अभी हाल में ही कुछ संगठनों के साजिश केे द्वारा देश में अस्थिरता पैदा करने के लिए और चुनाव में अपनेेे लाभ के लिए एक नया जातीय संघर्ष प्रारंभ कर दिया गया। जातीय संघर्ष मे आप भी बखूबी कूद गए गए। एससी/एसटी एक्ट के संशोधन पर भाजपा सरकार की बखिया उधे लते हुए, आपने जो अपराध नहीं किया था, उसके लिए जांच और सजा की प्रक्रिया में बदलाव की मांग करने लगे। ठीक है , आप पहले से ही कुछ ऐसा करना चाहते है, जिसकी जांच और सजा से आपको भी डर महसूस हो रहा है। नितांत दबी कुचली जात जो आज भी संघर्ष करने की स्थिति में नहीं है। या आपके सामने खड़ी नहींं हो सकती है, भला उस में कहां दम है कि आप पर झूठा मुकदमा लिखा दे। आप ज्यादती कर नहीं रहे है, तो भावी अपराध पर दुनिया भर का बखेड़ा क्यों ?
चलो ठीक है, आप की इच्छा थी, आप की मर्जी थी, आपने अपने को ही समाज में, सवर्ण संगठन के रूप में अलग कर लिया। चलो यह भी अच्छा हुआ, आप तो उनसे ऐसे भी अलग थे, वैसे भी उनसे ऊपर थे, तो यह उनके लिए कोई नई बात नहीं हुई।
तभी यहीं से कुछ खुराफाती लोगों के दिमाग में एक नोटा वोट देने का आइडिया डेवलप हो गया। कुछ लोगों को तो अच्छा लग रहा होगा और उद्देश्यय बनाया गया होगा कि इसके आधार पर भय दिखाकर हम मौजूदा भाजपा सरकार से तो संसोधन करा ही लेंगे। लेकिन सरकार अपनी मजबूरी बस ऐसा नहीं कर सकी। नोटा मतलब हम ने वोट दिया, लेकिन किसी भी पक्ष में नहीं है या सभी प्रत्याशी अयोग्य हैं। प्राथमिक बात यही है कि जब हमको अपने मंतव्य यानी वोट को किसी के प्रति नहीं जुड़वाना है तो भला हम अपना समय बर्बाद करके अपने या किसी साधन के द्वारा मतदान केंद्र तक क्यों जाएंगे। यदि जाएंगे भी तो लंबी लाइन क्योंं लगाएंगे, यदि लगाएंगे भी तो वोट क्यों डालेंगे ? यानी फिर हमारी कोई रुचि नहीं होगी, कि हम मतदान केंद्र तक जाएं और अपना मत बेकार करके चलें आए। वोट पड़ गए, हमारे मत नोटा में पड़ गया। बाकी सभी पार्टियों को अपने अपने समर्थकोंं के वोट मिले। उनमें में हार-जीत हो गई। हमारी इच्छा थी कि फलाना जीते, लेकिन वह 2 वोट से हार गया और हमारे पास नोटा के 500 बूट आ गए। तब हमे पछतावा होगा न कि एक गलत और गंदा आदमी सत्ता में आ गया। यदि हम बहकावे में ना आते, तो कम से कम हमारे मतलब की सरकार होती, तो ऐसा न होता। देश के लिए कुछ करने वाला व्यक्ति को राजनीति में जनता का प्रतिनिधित्व कर रहा होता। लेकिन इसकेेेे बाद पछताने से कोई बात बननेे वाली है।
हां, हम उनके सामने यह छाती जरूर पीटे के कह सकते हैं कि यदि तुमने हमारी बात मान ली होती तो हम तुम को 2 वोट से जिता दिए होते और हमारे देश के विकास के स्वर्णिम 5 वर्ष यूं ही हवा में चले गए। अब भला नोटा क्या कर लेगा? जिस नेता को आप भी दिखाना चाहते हैं, तो वह चुनाव के बाद आपके लिए क्या कर लेगा। और आप जिस जनता को नोटा का हथियार समझ कर प्रयोग कर रहे हैं जब जनता इसका हाल जान जाएगी, तब आप पर विश्वास कैसे करेंगी। जनता का नुकसान तो आपकी वजह से, उसका वोट नोटा में जाने के कारण हुआ। आपने बहुत कहा बहुत समझाया और वह नेता जी आपके पीछे पड़ा तब आप ने तय किया कि चलो अगली बार हम आपको बनाते हैं। लेकिन आप अगली बार भी हार गए। क्योंकि दूसरे ने अच्छी मेहनत की और चुनाव जीत गया। आप हाथ मलते रह गए। देश गड्ढे में चला गया।
इसलिए मान्यवर मैं समझता हूं नोटा का उपयोग ना तो प्रजातंत्र के पक्ष में होगा। न ही जनता के पक्ष में होगा और न ही आपके पक्ष में होगा। मैं समझता हूं कि हम लोगों को ऐसे लोगों का चुनाव किया जाना चाहिए, जो हमारी बात को संसद मैं उठा सकता हो, जनता का प्रतिनिधि बनकर करके क्षेत्र में काम करे, न कि जनता का राजा।
हो सकता है विचारों का यह संचरण, आपस में मेल न खाए तो उसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए। इस पर कोई भी प्रतिष्ठा न लगाई जाए और न ही बुरा माना जाए। यह समझा जाए कि आपके लिए किसी ने भी कुछ लिखा ही नहीं है। कटुता का प्रभाव न हमके होना चाहिए, न आपको होना चाहिए ॥
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