जब तक राजनीतिक नहीं चाहता है तब तक अधिकारी गलत नहीं होता है। हर विभाग से महीने में लिफाफा ऊपर की तरफ चलता है। ऊपरवाला बिक जाता है, उनके नीचे वाला पहलवान हो जाता है। ऊपरवाले उसके कदरदान और फिक्र करने वाले हो जाते हैं।
ठीक है आप राजनीतिक हैं या जन सेवक हैं याद समाज सेवक है तो इसका मतलब थोड़ा है कि अधिकारी को मारेंगे । कानून को फुटबॉल बनाएंगे। कानून राजनीतिक आदमी के हाथ का कठपुतली बन जाएगा। कुल मिलाकर के आप सत्ता मैं नहीं, जनता में अपना भैय पैदा करना चाहते हैं। और उस भय को सही भी ठहराना चाहते हैं। जिस संविधान की शपथ ले करके आप विधायक या सांसद बनते हैं। उसी संविधान से खेलना चाहते हैं। आप अपनी बात कहिये या आप सरकारी की शिकायत ऊपर वाले अधिकारी से करिये। लेकिन अधिकारी हो या जनता या अपराधी भी हो तब भी आपसे मारने के हकदार नहीं है I इन सभी के लिए स्थानीय स्तर पर पुलिस की व्यवस्था की गई है। पुलिस में जाइए I उसकी शिकायत करिए और तमाम रास्ते हैं, जिससे आप सरकारी कर्मचारी पर काम न करने का, उसे दंड दे सकते हो।
भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस हो या हिंदू के नाम पर कोई संगठन हो या कोई विपक्षी संगठन हो या किसी जात के नाम पर संगठन हो, किसी को देश में आरजकता फैलाने की अनुमति नहीं है। कोई भी पार्टी नही कहती है और न ही चाहती है कि उसके नाम पर किसी का अपमान किया जाए या किसी को मारा पीटा जाए या उसे किसी अन्य तरीके से प्रताडि़त किया जाए। लोगों को चाहिए कि अपने अंदर के शैतान को दावे और दूसरे जीवित को या सामने वाले को भी अपने जैसा इंसान माने, तभी बात बनने वाली है।
आज का मीडिया भी पार्टी, सत्ता और सबसे पहले अपना लाभ देखकर, समाचार छापता है या समाचार को दिखाता है। यानी देश की तमाम बातें तो समाज के सामने आ ही नहीं पाती।
तो यह न सोचा जाए कि सरकारी आदमी ही काम चोर होता है या गलत होता है।
जय भारत !
जय जय जय !
विनोद सचान
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