हमारे एक मित्र ने लिखा था शायद अभी हम परिपक्व नहीं हुए हैं ---
आज तक भला कोई बेवकूफ पैदा हुआ है दुनिया में। हर दूसरा आदमी सामने वाले को तो बेवकूफ समझता है और वही सामने वाला उसको बेवकूफ समझता है। सिलसिला चल रहा है जीव है, चार पैर से दो पैर में चलने लगा है तो इसने तमाम बारीकियां पैदा कर ली हैं। उन्हीं का नतीजा है कि वह किसी को अपने योग्य समझता ही नहीं है अच्छा समझना भी नहीं चाहिए क्योंकि प्रकृति में हर जीव के दिमाग में उसका अलग मस्तिष्क दिया है। तो उसके सोचने का तरीका तो अलग हो सकता है लेकिन वह अपनी समझ में दूसरों से बेहतर समझता है और बेहतर सोचता है। तो इसमें ना परेशान हूं चाहे अपने गांव के हो या बाहर के हो। बुद्धिमान होने के प्रदर्शन का अधिकार सबको है भाई।
एक सज्जन अमर सचान जी ने डीजल व पेट्रोल की कीमत की तुलना शराब की कीमत से करके राय चाही > तो एक मित्र सलोनी उमराव जी ने वाजिब बात कही तो वह अपनी उम्र व डिग्री बताकर अपने को बुद्धिमान बताया >
मेरा जवाब >>
Amar Sachan जी, देखिए आपके अन्दर मय आ गया है। जरूरी नहीं है कि आप सलिनी जी से ज्यादा समी हो। एम फिल और पीएचडी किसी विषय का ज्ञान दे सकता न कि ब्रम्हाण्ड का। उनको उन्हीं के हिसाब से आप जवाब दे दीजिए ना कि यह बताएं कि जब पैदा नहीं हुई थी तब से आप दुनिया चला रहे हो। श्रीमान जी ज्ञान तमाम तरीके की चर्चाओं से तमाम लोगों के सहयोग से धीरे-धीरे मिलता है। किसी की राय मानना नहीं है तो राय मांगना भी नहीं चाहिए। हो सकता है मेरी बात आपको बुरी लगे। लेकिन अभिमान भरे जवाब भी अच्छे नहीं होते हैं। इंसान को सहने की क्षमता रखनी चाहिए। जहां चार व्यक्ति होते हैं वह चारों भिन्न-भिन्न सलाह और मशविरा देंगे। हमें उनके विचारों की इज्जत करते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाना चाहिए। ज्ञान कभी जन्मजात नहीं होता है।
सलोनी उमराव का अत्साह बर्धन कर हमने लिखा-
Patel Saloni Umrao जी, आपकी बात विल्कुल सही है। जब हम शोसल बात करें तो वो सामाजिक ही हो और सभी हितो की रक्षा करने वाली हो ॥
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