आज देश के कोने कोने से खबरें आ रही हैं।हर वर्ग का व्यक्ति अपनी व्यथा को व्यक्त कर रहा है। किसी न किसी रूप में अपने अंदर के आक्रोश को बाहर कर रहा है, जिससे यह महसूस होता है कि देश के हर नागरिक के किसी न किसी कोने में यह अपने रक्षा सेनानियों से प्रेम की धारा बह रही है। इसमें यह पहचानना मुश्किल है कि कौन किस स्तर का व्यक्ति है। कौन धनवान है, कौन निर्धन है या कौन कर्मठ है और कौन आलसी है। यहां कुछ निर्णय नहीं हो पा रहा है। आज जो सामने दिख रहा है ,उससे यह महसूस होता है कि यह सभी हमारे देश के नागरिक हैं और इनकी देश के प्रति एक सोच है। यह जिस प्रकार हो सकता है, अपने मनोभावों को प्रकट कर आज आतंकियों के खिलाफ अपने उद्गारों को प्रकट कर रहे हैं।
ऐसे भाव का हम सभी एक समान स्वर में चाहते हैं कि आतंकियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करते हुए इन्हें हमेशा के लिए देश से बाहर कर दिया जाए। जम्मू कश्मीर के पुलवामा में भारतीय सेना के साथ, जिस प्रकार का आतंकी हमला किया गया, वह शर्मसार करने वाला था और संपूर्ण देश के नागरिकों को झकझोर गया। देश चाहता है कि कुछ ना कुछ ऐसी कार्रवाई की जाए जिससे दोबारा इस प्रकार के हादसे हमारे सैनिकों या देश में ना घट सके I
अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई हमारे देश के राजनीतिक और सुरक्षा सलाहकार या अन्य इकाइयां वाकई इस समस्या का हल करना चाहती हैं। तो हमें पूर्व की आतंकी घटनाओं का सबक न लेना भी कम दुख नहीं देगा। हमारे देश के राजनीतिक एक बार सत्ता में जब आ जाते हैं तो उनके पास केवल एक और एक लक्ष होता है कि दुबारा हम कैसे फिर से इस गद्दी पर बैठ जाए। तब उनको इस बात का ख्याल भी नहीं रह जाता है कि पूर्व में हमने जनता से क्या वादा किया था और हमें देश के लिए क्या करना है। मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी जी के अनुसार जिन्होंने सत्ता में आने से पहले यह वादा किया था कि हम आतंकियों और पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाएंगे कि भूल से भी हमारे देश या सैनिकों के साथ कोई घटना नहीं होगी। लेकिन यह बेचारे 5 साल ऐसा कुछ नहीं कर सके जिससे आतंकी या पाकिस्तानआतंकी घटनाएं करने में डरता। यदि उसी समय से इस दिशा में कार्य होना शुरू हो जाता तो मुझे यह महसूस होता है कि आज हमारे इतनी बड़ी संख्या में जवानों का शहीद होना, नहीं देखना पड़ता। इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद देश का मुखिया अपने उद्घाटन, शिलान्यास और रैलियों को नहीं रोक पाया और लगातार मंचों की शोभा बढ़ाते रहें। मंच से ललकारना या यह कहना कि सेना जिस तरीके से चाहे बदला ले ले, इस समस्या का हल नहीं हो सकता है। तरीका यह था कि इस घटना के तुरंत बाद, बजाय हाव-हल्ला मचाने के या मंच से ललकारने के एक अति गोपनीय उच्च शिक्षा प्रमुखों के साथ बैठक करनी चाहिए थी। जिसमें यह तय करना था कि किस प्रकार से हम ऐसा आतंकियों और पाकिस्तान को सबक सिखाएं कि दुबारा ऐसी घटनाएं न हो पाए। लेकिन हो सकता था गुप्त कार्रवाई में शायद वोटों की राजनीति नहीं हो पाती।
पार्टी या व्यक्ति कोई भी हो उसे शहादत पर किसी भी प्रकार की राजनीति करने का हक नहीं है। यदि वह राजनीति करता है तो शायद वह देश का सबसे गिरा हुआ नागरिक नहीं, बल्कि दुश्मन होगा। मैं किसी भी पार्टी की बात न करके, किसी भी राजनीतिक की बात न करके, सीधे-सीधे यही कहूंगा कि बिना किसी चकल्लस या भेदभाव या हार-जीत की भावना के, ऐसा कदम उठाना चाहिए जिससे देश का एक-एक नागरिक संतुष्ट हो जाए। आज देश जा रहा है कि वाकई कुछ ऐसा हो कि हमारा एक भी सैनिक मारा न जाए।
इस समस्या का हल युद्ध भी नहीं है और न ही सीधे-सीधे किसी दूसरे देश के नागरिकों का हताहत करना। हमें अपने पड़ोसियों पर भी नजर रखनी होगी जो हमारी प्रगति को देखकर के, हमें युद्ध में उलझाना चाहते हैं। सीधे-सीधे युद्ध में देश को नहीं रोका जा सकता है और उससे भी कोई हल निकलने वाला नहीं है। जिस तरीके से दूसरे बड़े देश अपनी सुरक्षा और अपने नागरिकों के हित के लिए किसी भी स्तर तक जा कर के, अपने विद्रोही संगठनों का विनाश करते हैं। उसी तरीके से हमें भी अपने देश के विरुद्ध सुनियोजित हमला कर रहे आतंकियों को जड़ से साफ करने के लिए, चाहे पाकिस्तान के भीतर तक क्यों न जाना पड़े। हमें ऐसा कुछ करना चाहिए कि उनके एक-एक कैंप का बिल्कुल सफाया कर देना चाहिए और ऐसा संदेश दे देना चाहिए कि दोबारा कोई आतंकी संगठन भारत की तरफ नजर उठाकर न देख सके।
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