आज मीडिया चाहे इलेक्ट्राट्रानिक मीडिया हो या चैनल या अखबार, जिस स्तर पर खड़ी है। उससे यह लगता है कि देश की जनता के साथ लगातार मजाक किया जा रहा है। मजे की बात यह है एक ही अखबार में समाचार और विद्ववतापूर्ण लेख की लेखन मे विरोधाभास होने के साथ-साथ बड़े ही तीखे ढंग से एक पार्टी की तरफ से दूसरी पार्टी के ऊपर किया गया है। ऐसा महसूस हो रहा है कि जैसे यह संपूर्ण अखबार सीधे-सीधे सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी को समर्थन कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह अब जनता के लिए ना हो करके और स्वतंत्र लेखन न करके मात्र एक पार्टी का मुखपृष्ठ बन गया है। ऐसी हालातों में निष्पक्ष समाचारों का पाना बहुत ही मुश्किल हो गया है।
आइए देखते हैं की दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ संख्या 3 में चुनावी रंजिश में हुई पूर्व प्रधान की हत्या नामक शीर्षक के तहत समाचार लिखा गया है। इसी में यह लिखा गया है कि पुलिस द्वारा बताया गया जांच में पाया गया कि पूर्व प्रधान की हत्या प्रधानी चुनाव की रंजिस में किया गया। आइए देखते हैं कि दैनिक जागरण ने क्या लिखा है--
अब दूसरी तरफ इसी अखबार का पक्षपाती रुख देखते हैं जो उसने अपने संपादक की में लिखा है--
हसवा नेहा पर पूर्ण प्रधान सुरेंद्र सिंह को भाजपा का कार्यकर्ता बताते हुए उसकी बड़ाई में तमाम चार चांद लगाए हैं। इसी मामले को गांधी जी के गांधीवाद से तुलना कर दिया गया है। इतना में तमाम तरीके के सवाल उठाए गए हैं। बजाय कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने के गांधीवाद को दोषी बनाया गया है। और देखे क्या और कैसा लिखा गया है--
अजब हम अपने सामने एक ही तारीख में एक ही समस्या का बराबर प्रहार किया जाना और एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में समाचार का रखा जाना अच्छा नहीं लग रहा है। समाचार में साफ उसने कहा है कि पूर्व प्रधान सुरेंद्र सिंह का मर्डर पूर्व की प्रधानी की रंजिश में किया गया है यानि अब इसमें कुछ ढूंढने और समझने लायक नहीं बचा है। यह सच भी है कि प्रधानी के समय से ही आपस में रंजिश चला करती है कोई इस पार्टी में शामिल हो जाता है तो दूसरा उसकी विपक्ष की पार्टी में शामिल हो जाता है। यही सुबह हो जाता है एक दूसरे को नीचा दिखाने का काम । जाहिद सी बात है कि जीता हुआ व्यक्ति जरूर-जरूर अपने सामने वाले विपक्षी को तमाम प्रकार से पताणित करने की कोशिश करेगा। इसी कोशिश में रंजिश पति आती है और एक दूसरे पर जानलेवा हमला करने लगते हैं।
अखबार अपने संपादकीय में समाचार छपने के बाद भी यह तय नहीं कर पाए कि प्रधान की मौत किस कारण हुई है। जबकि पुलिस के रिपोर्ट में साफ है कि अभी तक जो सामने आया है उसके अनुसार प्रधानी के चुनाव की रंजिश है। आज गांधीवाद के सवाल उठाने वाले इस अखबार ने यह नहीं कहा कि गोडसे ले गांधीजी की सरेआम जान ले ली थी। तब या तो यह अख़बार था नहीं या फिर यह लोग जानबूझकर के जनता में एक अलग झूठा और गलत तरह के मुद्दे को जिंदा करना चाहते हैं।
इस संपादक को यह देखना चाहिए कि हत्या इंसान की होती है। इसमें न तो गांधीवाद की होती है, न ही गोडसे वाद की होती है। यहां साफ जाहिर है कि मरता केवल इंसान है और मारने वाले भी होते तो इंसान है लेकिन उनमें इंसानियत नहीं रह जाती है। मैं अपने विद्वान संपादक और विद्वान संवाददाताओं से यह प्राथना करूंगा और यह चाहूंगा कि आप अपनी विश्वनीयता काम करने के लिए, अपने आपको इस राजनीति के चक्कर से अलग रखते हुए अच्छे प्रयास करें।
///// विनोद सचान /////


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