Saturday, July 6, 2019

देश का बजट

देश का बजट >>
देश में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ और इसे बजट या बजट पास करने के तरीके में खास तौर पर देखा जा सकता है। बहुत ही अथक प्रयास किए जा रहे हैं कि देश में परिवर्तन हो, किसी भी तरीके से परिवर्तन दिखे, लेकिन यह जो परिवर्तन है न, यह दिखने का नाम ही नहीं ले रहा है। लेकिन यह लोग भी पक्के हैं कैसे नहीं दिखेगा, इन्होंने कभी पढ़ा था, "करत करत अभ्यास ते", वहीं अभ्यास यह लगातार आज भी कर रहे हैं। इन्हें हो चाहे न हो लेकिन हमें उम्मीद है कि एक न एक दिन परिवर्तन अवश्य होगा। जब होगा तो दिखेगा, जरूर दिखेगा।

अब देख लीजिए, भाई पुरुषों का काम तो है नहीं घर की देखभाल करना और बार-बार पुरुष ही देश का बजट प्रस्तुत करें, यह थोड़ा भद्दा दिख रहा था। अरे भाई आज हर घर का मालिक स्त्री ही तो होती है। जब पूरे खर्चों का ध्यान रखती है, तो क्यों न बजट स्त्री ही प्रस्तुत करें। सो मोदी जी ने फट से जेटली जी को बताया और निर्मला सीतारमण जी को वित्त मंत्रालय थमाया। यह मिला जी भी देश की सीमाओं पर जाकर व्यवस्थाएं देख चुकी थी और देश की सुरक्षा की आवश्यकताओं को देख चुकी थी, सो भाई ! वह भी आ गई वित्त मंत्रालय में खर्चों का विश्लेषण करके बजट तैयार करने के काम में। तो पहला ही परिवर्तन यह हुआ कि देश की किसी पूर्ण कालिक महिला वित्त मंत्री ने देश का बजट प्रस्तुत किया।

देश का बजट पहले विदेशों जैसा ब्रीफकेस में प्रस्तुत किया जाता था, कितना भद्दा लगता था, अपने यहां का आदमी और अंग्रेजो जैसा ब्रीफकेस में बजट प्रस्तुत कर रहा था। इसमें भी काफी फर्क था कि काला आदमी और हाथ में ब्रीफकेस, तब देश का बजट I सभी विसंगतियों को दूर करते हुए मोदी जी ने अपनी घोषणाओं के अनुरूप नए अंदाज में प्रस्तुत कराया। लाल रंग की मखमली कपड़े में लिखते हुए बही खाते को हाथों में दबाए वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण ने लोकसभा में प्रस्तुत किया। वाकई परिवर्तन हुआ और बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ। इस इसके लिए मोदी जी बधाई के पात्र हैं।

 तमाम परिवर्तन तो यह अखबार करा देते हैं। सुबह-सुबह ही हिंदुस्तान पेपर दिमाग पर मोटे मोटे से लिख दिया अमीर पर कर, गरीब पर करम। अब दिमाग पर बनना शुरु हो गया कि लगता है, बजट बहुत ही अच्छा व सुहावना है। अब आगे महीन अक्षरों को पढ़ने की जरुरत ही नहीं रह जाती। जो ज्यादा महीन ताई के शब्द होते हैं, उन्हें पहले ही सरकार अपने पास रख लेती है। जागरण तो जाहिर है, जैसी सरकार, वैसा नारा लगाता है। उसने तो लिख दिया नये भारत की ओर। मैं अचकचा गया, दिमाग कहां था और कहां आ गया। मुझे तो लगता है इन्होंने लगाए पूरा जोर, परिवार का कोई चला जाए सांसद की ओर। अब सोच रहे थे, क्या पढ़े, सब कुछ अच्छा ही अच्छा है। यह अखबार वाले भी अच्छी खासी मति पलट देते हैं। समाचार से लाकर, प्रचार में अटका देते हैं।

 अपने को तो न बजट से फायदा होना था। न नुकसान होना था। न घाटे मे आना था। न कहीं दूर तक जाना था। सो मोटिया टाइप का पढ़ लिया, और दिमाग में बैठा लिया, भला सेठों का ही होना है। अभी चुनाव तो हैं नहीं, जो जनता के हुक्का पानी पर रहम करेगा या उसकी रोटी कपड़ा और मकान की व्यवस्था करेगा।

चाहे जैसा भी कह लो,
तुम्हारा बजट बेईमानी है।
यदि भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा,
तो विकास एक कहानी है ॥

जय भारत !
जय जय जय !
"विनोद सचान ''

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