Saturday, September 22, 2018

22-09-2018

जम्मू कश्मीर की समस्या उठाने पर, इंद्रजीत सिंह जी ने कहा जब तक नेताओं को नोटा का भय नहीं होगा, तब तक ऐसे ही बेवकूफ बनाते रहेंगे जनता को ।
उनके इस नोटा के सवाल पर मैं उन्हें जवाब दे रहा हूं ---

इंद्रजीत सिंह जी, आप काफी दिन से नोटा के पक्ष में काफी अच्छा माहौल बना रहे हैं। हो सकता है कि यह आपके दृष्टि में महत्वपूर्ण या फिर यह कोई निर्णायक बिंदु हो, जो राजनीति में आपके अनुसार विभिन्न पहलुओं पर दबाव बनाकर, उनमें देश के प्रति कुछ जागृत हो। यहां पर कुछ का मतलब देश प्रेम या जनता प्रेम है या समस्या के निस्तारण से है या भ्रष्टाचार को समाप्त करने जैसा भाव से।
वर्तमान में राजनीति को जिस तरीके से तोड़ा मरोड़ा गया है उस का विकृत रूप आज सामने आया है जिसमें जनता को नेपथ्य में डालकर राजनैतिक जिसे जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाया था। उसनेे अपनी स्थित को मजबूत करते हुए प्रजातंत्रर को महत्त्व हीन कर दिया। ऐसेे लोगों को भला आप नोटा के माध्यम से क्या संदेश दे लेंगे।
इंद्रजीत सिंह जी पहले तो आप यह सोचें कि आपको नोटा की आवश्यकता क्यों पड़ी। नोटा का मौजूदा चुनाव में क्या असर पड़ेगा और नोटा से आपके पक्ष में या जनता के पक्ष में क्या निर्णय आएगा ??
इस नोटा के पूर्व आपके दिलो और दिमाग पर भाजपा का पूर्ण प्रभाव था। अभी हाल में ही कुछ संगठनों के साजिश केे द्वारा देश में अस्थिरता पैदा करने के लिए और चुनाव में अपनेेे लाभ के लिए एक नया जातीय संघर्ष प्रारंभ कर दिया गया। जातीय संघर्ष मे आप भी बखूबी कूद गए गए। एससी/एसटी एक्ट के संशोधन पर भाजपा सरकार की बखिया उधे लते हुए, आपने जो अपराध नहीं किया था, उसके लिए जांच और सजा की प्रक्रिया में बदलाव की मांग करने लगे। ठीक है , आप पहले से ही कुछ ऐसा करना चाहते है, जिसकी जांच और सजा से आपको भी डर महसूस हो रहा है। नितांत दबी कुचली जात जो आज भी संघर्ष करने की स्थिति में नहीं है। या आपके सामने खड़ी नहींं हो सकती है, भला उस में कहां दम है कि आप पर झूठा मुकदमा लिखा दे। आप ज्यादती कर नहीं रहे है, तो भावी अपराध पर दुनिया भर का बखेड़ा क्यों ?
चलो ठीक है, आप की इच्छा थी, आप की मर्जी थी, आपने अपने को ही समाज में, सवर्ण संगठन के रूप में अलग कर लिया। चलो यह भी अच्छा हुआ, आप तो उनसे ऐसे भी अलग थे, वैसे भी उनसे ऊपर थे, तो यह उनके लिए कोई नई बात नहीं हुई।
तभी यहीं से कुछ खुराफाती लोगों के दिमाग में एक नोटा वोट देने का आइडिया डेवलप हो गया। कुछ लोगों को तो अच्छा लग रहा होगा और उद्देश्यय बनाया गया होगा कि इसके आधार पर भय दिखाकर हम मौजूदा भाजपा सरकार से तो संसोधन करा ही लेंगे। लेकिन सरकार अपनी मजबूरी बस ऐसा नहीं कर सकी। नोटा मतलब हम ने वोट दिया, लेकिन किसी भी पक्ष में नहीं है या सभी प्रत्याशी अयोग्य हैं। प्राथमिक बात यही है कि जब हमको अपने मंतव्य यानी वोट को किसी के प्रति नहीं जुड़वाना है तो भला हम अपना समय बर्बाद करके अपने या किसी साधन के द्वारा मतदान केंद्र तक क्यों जाएंगे। यदि जाएंगे भी तो लंबी लाइन क्योंं लगाएंगे, यदि लगाएंगे भी तो वोट क्यों डालेंगे ? यानी फिर हमारी कोई रुचि नहीं होगी, कि हम मतदान केंद्र तक जाएं और अपना मत बेकार करके चलें आए। वोट पड़ गए, हमारे मत नोटा में पड़ गया। बाकी सभी पार्टियों को अपने अपने समर्थकोंं के वोट मिले। उनमें में हार-जीत हो गई। हमारी इच्छा थी कि फलाना जीते, लेकिन वह 2 वोट से हार गया  और हमारे पास नोटा के  500 बूट आ गए। तब हमे पछतावा होगा न कि एक गलत और गंदा आदमी सत्ता में आ गया। यदि हम बहकावे में ना आते, तो कम से कम हमारे मतलब की सरकार होती, तो ऐसा न होता। देश के लिए कुछ करने वाला व्यक्ति को  राजनीति में जनता का प्रतिनिधित्व कर रहा होता। लेकिन इसकेेेे बाद पछताने से कोई बात बननेे वाली है।
हां, हम उनके सामने यह छाती जरूर पीटे के कह सकते हैं कि यदि तुमने हमारी बात मान ली होती तो हम तुम को 2 वोट से जिता दिए होते और हमारे देश के विकास के स्वर्णिम 5 वर्ष यूं ही हवा में चले गए। अब भला नोटा क्या कर लेगा? जिस नेता को आप भी दिखाना चाहते हैं, तो वह चुनाव के बाद आपके लिए क्या कर लेगा। और आप जिस जनता को नोटा का हथियार समझ कर प्रयोग कर रहे हैं जब जनता इसका हाल जान जाएगी, तब आप पर विश्वास कैसे करेंगी। जनता का नुकसान तो आपकी वजह से, उसका वोट नोटा में जाने के कारण हुआ। आपने बहुत कहा बहुत समझाया और वह नेता जी आपके पीछे पड़ा तब आप ने तय किया कि चलो अगली बार हम आपको बनाते हैं। लेकिन आप अगली बार भी हार गए। क्योंकि दूसरे ने अच्छी मेहनत की और चुनाव जीत गया। आप हाथ मलते रह गए। देश गड्ढे में चला गया।
इसलिए मान्यवर मैं समझता हूं नोटा का उपयोग ना तो प्रजातंत्र के पक्ष में होगा। न ही जनता के पक्ष में होगा और न ही आपके पक्ष में होगा। मैं समझता हूं कि हम लोगों को ऐसे लोगों का चुनाव किया जाना चाहिए, जो हमारी बात को संसद मैं उठा सकता हो, जनता का प्रतिनिधि बनकर करके क्षेत्र में काम करे, न कि जनता का राजा।
हो सकता है विचारों का यह संचरण, आपस में मेल न खाए तो उसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए। इस पर कोई भी प्रतिष्ठा न लगाई जाए और न ही बुरा माना जाए। यह समझा जाए कि आपके लिए किसी ने भी कुछ लिखा ही नहीं है। कटुता का प्रभाव न हमके होना चाहिए, न आपको होना चाहिए ॥




Friday, September 21, 2018

20-09-2018

एसके सिंह ने यह कहा कि मैं मोदी जी की बुराई नहीं सुन सकता और बताया कि नोटबंदी, जीएसटी -आज कोई 56 इंच का सीने वाला व्यक्ति ही कर सकता है, ला सकता है।

उसी का जवाब में उनको दे रहा हूं । देखें और कोई कमी हो तो इंगित करें --

ठीक है, अपना विश्वास है, अपनी राय है, अपना मत है, लेकिन किसी दूसरे से यह अपेक्षा कर लेना कि नहीं जो मेरी सोच है, जो मैं कर रहा हूं या जिसके लिए कर रहा हूं, उसके लिए हमारे मित्र भी करें, तो ऐसा तो वही व्यक्ति कर सकता है, जो किसी के साथ मानसिक ज्यादती करेगा। जरूरी नहीं है कि जो हम सोच रहे हैं, वह सही है और सब के लिए सही है, अधिकतर तो होता यह है की आमजन की बात बहुत ही कम लोग करते हैं। जबकि सभी स्वार्थ पूर्ति हेतु कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं। तमाम लोग किसी नेता से जाति के कारण जुड़े हैं, तो तमाम लोग किसी नेता से अपने लाभ के कारण जुड़े हैं, तो तमाम लोग अपने किसी घर के व्यक्ति के कारण या किसी अन्य कारण से जुड़े हुए हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो देश के लिए किसी से जुड़ते हैं और देश के लिए करते हैं। आज अर्थ युग है हर व्यक्ति का यही दृष्टिकोण है कि किस प्रकार से हम ज्यादा से ज्यादा धन का अर्जन करें। भले ही वह उचित मार्ग से आए या अनुचित मार्ग से आए। तो संभव नहीं है कि जितनी आर्थिक स्थिति हमारी मजबूत है, इतनी सामने वाले की भी हो और वह हमारे साथ चल दे। अपना समय भी दे और अपना रोटी कमाने का समय जाया करें ऐसा संभव नहीं है।
इसीलिए अब नेताओं के पीछे चलने वालों लोगों की संख्या में कमी आती जा रही है।
रह गई बात नोटबंदी की तो इसको किसी भी दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार से सफल नहीं कहा जा सकता है इस नोटबंदी ने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया है और ना ही इस से कोई राष्ट्रीय राष्ट्र उपलब्धि प्राप्त हुई है बल्कि लचर और गंदे तरीके से इस योजना को लागू करने के कारण पल-पल में बल्ले नियम और बढ़ाएं गए समय से के कारण पूर्णरूपेण यह योजना भ्रष्टाचार के अधीन हो गई थी हां गरीब के घर का सदस्य पैसा निकल कर बैंक तक पहुंच गया और बदल गया इस योजना से ना तो किसी पूंजीपति और भ्रष्टाचारी का रुपया रुका मैंने जरूर ले ले देकर के तमाम तरीकों से इन सभी पूंजीपतियों का पूरा का पूरा बदल दिया था इससे दिक्कत उन गरीबों को हुई थी जिनको उस समय किसी दुर्घटना के कारण पैसे की आवश्यकता थी उनको अपना समय के साथ-साथ अपने पारिवारिक किसी का बेटा किसी की पत्नी तो किसी का पिता तो किसी का बाबा तो किसी का जाए किसी न किसी से उसको भी छोड़ना पड़ा था हर बैंकों में लंबी लाइन थी हर अस्पताल में पुराने नोट की जगह नए नोट की मांग की जा रही थी हर व्यक्ति आपूर्ति करने में सक्षम नहीं था आज भी जब रिजर्व बैंक यह कहता है कि 99% धन वापस आ गया तो फिर एक परसेंट तो पूरे देश विदेश में कहीं न कहीं यह मुद्रा छिपी रह सकती है इसलिए हम उसको किसी भी हालत में सफल और अच्छा नहीं कह सकते हैं

और अब जीएसटी में चलते हैं। जीएसटी भारत सरकार का कोई अच्छा कार्यक्रम नहीं रहा। आज भी इस देश में और अपने निवास प्रदेश, उत्तर प्रदेश में मैं सरेआम देख रहा हूं कि तमाम उत्पादन ऐसे हैं जिन पर जीएसटी अदा ही नहीं की जा रही है। जैसे कभी इस प्रदेश में सेल टैक्स हुआ करता था, सेल टेक्स के बाद वेट आया, तो यहां का व्यापारी भयभीत हो गया था। लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला था। वही ढाक के तीन पात, बगैर चोरी के इन प्रदेशों में तभी व्यवसाय नहीं चल सकता है और यह संभव ही नहीं है। जब तक कि सरकारें अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति न रखती हो, जीएसटी में भी केंद्र सरकार ने तमाम तरह के नियम बनाए। इसको इतना कठिन कर दिया कि व्यापारी हड़बड़ा गया। बाद में जीएसटी विभाग वाले ही हड़बड़ा गए और उन्होंने इस को ऐसा कर दिया कि वेट से भी गया गुजरा हो गया केवल कागज के नाम पर आप खानापूर्ति करनी है। खानापूर्ति के बाद फिर वही उगाही, अधिकारी आज भी चौराहे पर खड़े होकर के जीएसटी के नाम पर रात में लूटते हैं। परिणाम कुछ नहीं है जैसा चल रहा था, वैसा आज भी चल रहा है। तो जनता को कोई फायदा नहीं नजर आया हमको हां टैक्स बढ़ गए इसकी वजह से केंद्र सरकार के खजाने तक पैसा कुछ ज्यादा बढ़ गया तू इन योजनाओं से तब तक फायदा नहीं है। जब तक हम सही ढंग से उचित मानिटरिंग या मूल्यांकन से योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वन नहीं करेंगे, किसी भी योजना से सरकार को, या जनता को राहत मिलने वाली नहीं है। बल्कि इसी बीच में अधिकारी कर्मचारी अपनी तो बना लेता है और जनता पिसती रहती है।मेरे हिसाब से जीएसटी से जनता को कोई सहूलियत नहीं मिली है।
तो सही बात तो यही है कि जीएसटी की वजह से कुछ व्यापारी बीच में कमा खा जरूर रहे हैं। लेकिन जनता आज भी हैरान और परेशान है।
 सीना 56 इंच यह बात भी कुछ समझ में नहीं आती है। प्रदेश का कार्यालय हो या देश का कार्यालय हो, इसमें अगर देखें तो हर कदम पर बगैर पैसे का कोई काम नहीं हो रहा है। आज भी भ्रष्टाचार का कोई पुरसाहाल नहीं है। हर योजना में भ्रष्टाचार का पूर्ण रूप से बोलबाला है। आपने इन्हीं दो योजनाओं का उल्लेख किया था। मैंने इन्हीं दो योजनाओं का जैसा जनता की नजर में जो है, उसका उल्लेख किया है। मूल्यांकन करना आपका काम है और जो भी समझना या न समझना वह भी आपका काम है। लेकिन जनता भी मूल्यांकन करती है और उसी मूल्यांकन के आधार पर, उसने केंद्र में बदलाव किया था। यदि ऐसा ही सब कुछ चलेगा, और उसको कुछ अलग दिख नहीं रहा है, तो जनता भी मूल्यांकन करने को तैयार है।

रह गई बात, किसी बात के पसंद आने की, न आने की, तो सच तो हमेशा कड़वा होता है और यह पुराने समय से चला आ रहा है। यदि कहीं कुछ गड़बड़ चल रहा है और उसको हम संज्ञान में न ले करके केवल सब ठीक चल रहा है, तो हमारी बहुत बड़ी भूल होगी। मै भी सरकार बनने के पूर्व मोदी जी के साथ था और आज साथ रह कर केन्द्र व राज्य सरकार को सचेत करने का कार्य कर रहा हूं। 

 अभी हाल में ही राफेल कंपनी के विमानों के निर्माण के लिए एच ए एल भारत सरकार की कंपनी है, उसे अयोग्य घोषित करके, अंबानी की कंपनी को काम दे दिया गया। इस संबंध में हमने पोस्ट किया कि "यदि भारत सरकार की एच ए एल कंपनी इतनी ही कमजोर है तो इसका अंबानी की कंपनी में कर दिया जाए और यह मोदी जी की एक बड़ी उपलब्धि होगी।
इस पर राज गंगवार जी कमेंट किया कि जानकारी के लिए धन्यवाद और कोशिश करें कि टाटा बिरला और सब कंपनियां बंद करवा दिया जाए।

इस संबंध में हमने राज गंगवार जी को नीचे लिखा हुआ जवाब प्रस्तुत किया ---
भारत सरकार की एच ए एल कंपनी काफी समय से कई प्रकार के विमानों का निर्माण करने का कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है। जिस समय राफेल विमानों का सौदा फ्रांस से किया गया था, तब यही बात थी कि एचएएल को ही राफेल विमान निर्माण के लिए अधिकृत किया जाएगा। फिलहाल देश में व्यक्तिगत कंपनी या सरकारी क्षेत्र की किसी भी कंपनी के पास इतना अनुभव नहीं है कि वह राफेल कंपनी का विमान को निर्माण की गति दे सके। जब सौदा  परिपक्वता पर आया तो विभिन्न प्रकार के प्रयासों से सरकारी नीतियों के कारण राफेल विमान के निर्माण की जिम्मेदारी अंबानी के कंपनी को दे दी गई। फिर हाल अंबानी के कंपनी के पास विमान बनाने का कोई पुख्ता आधार और अनुभव नहीं है। इससे जाहिर है कि भारत सरकार द्वारा अनुभव और योग्यता को दरकिनार करते हुए जानबूझकर लाभ पहुंचाने के लिए एच ए एल के बजाय अंबानी की कंपनी का चयन किया गया। हाल में ही फ्रांस की मीडिया में भी राफेल का भारत से सौदा छाया रहा था। जिसकी थोड़ी बहुत गतिविधि भारत तक आ पहुंची थी। रह गई बात Tata की, Tata कंपनी अपने आप में बहुत ही धीर-गंभीर और सुनियोजित प्रणाम देने वाली कंपनी है। किंतु इधर देखा जा रहा है कि उसे किसी भी केंद्रीय योजना में किसी प्रकार का वरीयता नहीं मिल रही है वरीयता न मिलने के कुछ ठोस वजह भी होंगे और जाहिर सी बात है कि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण Tata कंपनी को बुलाया नही जा रहा है। अभी हाल में Tata कंपनी के रतन Tata जी ने मोहन भागवत के साथ मुलाकात की थी जहां पर यह महसूस हो रहा है की सत्ता के अभिन्न अंग कि मदद के बगैर शायद ही किसी कंपनियां या व्यक्ति का बढ़ना मुमकिन है। उन दूसरी कंपनियों की तो बात ही छोड़ दी जाए जिन्होंने मोटा चंदा पार्टी के साथ उसके आनुषंगिक संगठनों को साथ नहीं दिया है।
राज गंगवार जी, कंपनियां सरकार चलाएं या चलवाए यह सरकारी पैसा इन कंपनियों में लगाए तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं होगा। विभिन्न टैक्स के द्वारा जनताा से सरकार तक पहुंचा रुपैया का उचित प्रबंध न किया जाना, अपने आप में दुखदाई है। मौजूदा सरकार 4 साल से लगातार बैंकों को मजबूूूत कर रही है। कभी जनधन खातों में जनता सेेे पैसा डलवाा कर तो कभी बैंकों को जनता का पैसा देकर । आज भी बैंकों की हालत किसी से छिपी नहीं है। केवल यह कह कर के की बैंकिंग की विसंगतियां पूर्व सरकार की देन है देश हित मेंं इसको टाला नहीं जा सकता है।
 जय भारत ! जय जय जय !

Saturday, September 15, 2018

15-09-2018


हमारे एक मित्र ने लिखा था शायद अभी हम परिपक्व नहीं हुए हैं ---

आज तक भला कोई बेवकूफ पैदा हुआ है दुनिया में। हर दूसरा आदमी सामने वाले को तो बेवकूफ समझता है और वही सामने वाला उसको बेवकूफ समझता है। सिलसिला चल रहा है जीव है, चार पैर से दो पैर में चलने लगा है तो इसने तमाम बारीकियां पैदा कर ली हैं। उन्हीं का नतीजा है कि वह किसी को अपने योग्य समझता ही नहीं है अच्छा समझना भी नहीं चाहिए क्योंकि प्रकृति में हर जीव के दिमाग में उसका अलग मस्तिष्क दिया है। तो उसके सोचने का तरीका तो अलग हो सकता है लेकिन वह अपनी समझ में दूसरों से बेहतर समझता है और बेहतर सोचता है। तो इसमें ना परेशान हूं चाहे अपने गांव के हो या बाहर के हो। बुद्धिमान होने के प्रदर्शन का अधिकार सबको है भाई।



एक सज्जन अमर सचान जी ने डीजल व पेट्रोल की कीमत की तुलना शराब की कीमत से करके राय चाही > तो एक मित्र सलोनी उमराव जी ने वाजिब बात कही तो वह अपनी उम्र व डिग्री बताकर अपने को बुद्धिमान बताया >

मेरा जवाब >>

Amar Sachan जी, देखिए आपके अन्दर मय आ गया है। जरूरी नहीं है कि आप सलिनी जी से ज्यादा समी हो। एम फिल और पीएचडी किसी विषय का ज्ञान दे सकता न कि ब्रम्हाण्ड का। उनको उन्हीं के हिसाब से आप जवाब दे दीजिए ना कि यह बताएं कि जब पैदा नहीं हुई थी तब से आप दुनिया चला रहे हो। श्रीमान जी ज्ञान तमाम तरीके की चर्चाओं से तमाम लोगों के सहयोग से धीरे-धीरे मिलता है। किसी की राय मानना नहीं है तो राय मांगना भी नहीं चाहिए। हो सकता है मेरी बात आपको बुरी लगे। लेकिन अभिमान भरे जवाब भी अच्छे नहीं होते हैं। इंसान को सहने की क्षमता रखनी चाहिए। जहां चार व्यक्ति होते हैं वह चारों भिन्न-भिन्न सलाह और मशविरा देंगे। हमें  उनके विचारों की इज्जत करते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाना चाहिए। ज्ञान कभी जन्मजात नहीं होता है।
सलोनी उमराव का अत्साह बर्धन कर हमने लिखा-

Patel Saloni Umrao जी, आपकी बात विल्कुल सही है। जब हम शोसल बात करें तो वो सामाजिक ही हो और सभी हितो की रक्षा करने वाली हो ॥

Sunday, September 9, 2018

09-09-2018

डग्गामार के संबंध में कुछ कार्रवाई न होने के बाद, आज से 15 साल पूर्व की स्थिति में और आज की स्थिति में परिवर्तन ना होने के स्थिति में अपनी एक पोस्ट के संबंध में हमने लिखा >>

3 वर्ष पूर्व डग्गामार के संबंध में। जो स्थित कल थी, वह स्थित है आज । कोई भी परिवर्तन ना हुआ है, ना दिख रहा है। जो एक चीज देखने में आ रही है , पुलिस भगाती है, डग्गामार फिर हावी हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे पुलिस की कोई मजबूरी है। कोई राजनीतिक दल तो हस्तक्षेप करता ही नहीं है क्योंकि उसे अपने शासन में यही डग्गामार कराकर कमाना होता है। समाजसेवी इसलिए मजबूर है कि कोई भी सुनने वाला नहीं है। एक आध घंटे के लिए हट भी जाएंगे तो यह फिर से डट जाते हैं॥ समाचार पत्रों में सरकारी विज्ञापन होता है तो उसमें स्थान नहीं मिलता है ऐसे समाचारों को। समस्याएं हैं लेकिन इनके हल्की किसी को सकता नहीं है। दुर्घटना होगी एक आध मरेंगे तो इसके बाद एक दो दिन डग्गामारी बंद रहेगी इसके बाद फिर शुरू हो जाती है। यानी कुल मिलाकर कानून का कहीं भी राज नहीं है। जैसा आज से 10- 12 साल पहले होता था तीन-चार साल पहले होता था। वैसा ही इस सरकार में हो रहा है। ना तो कहीं कानून दिखता है ना सरकार दिखती है। जनता है ऐसे ही जीती है ऐसे ही मर जाती है। यहां किसी चिंता है किसी के मरने जीने की ।

हमारे Facebook के मित्र शरद सचान द्वारा मनमोहन सिंह को पुनः योग्य प्रधानमंत्री बताए जाने पर हमने अपनी बात को स्पष्ट किया

शरद जी, मजबूरी में किसी को सत्ता थमा दी जाए वह एक अलग चीज है। वरना जो बात नए लोगों में होती है, जो विजन लोगों में होता है, जो बदलाव की चाहत नए लोगों में होती है, वह पुराने लोगों में नहीं होती। मनमोहन सिंह के जमाने में ही घोटालों की बहुत बड़ी फेहरिस्त थी। एक राष्ट्र संचालक द्वारा अपने ऊपर या नीचे हो रहे घोटाले को न समझ पाना उसकी बहुत बड़ी असमर्थता होती है। जहां तक मेरा मानना है कि हम मनमोहन सिंह को एक देश के लिए उचित प्रधानमंत्री नहीं कह सकते हैं। इन्होंने कभी भी जनता के सवालों का जवाब जनता के सामने आकर नहीं दिया है और आज भी जबकि यह विपक्ष में हैं इनको इनकी नीतियों का समय-समय पर समीक्षा करना चाहिए, उसका विरोध करना चाहिए। उसके पक्ष या विपक्ष में कुछ अपनी राय दाखिल करना चाहिए। आज भी शांत है तब भी शांत थे और आगे बना दोगे तब भी शांत ही रहेंगे। अब यह देश को वाकई ऐसा शासक चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि जनता को कानून का पालन करना होगा और कानून अपना काम उचित ढंग से करेगा। कोई भी अपराधी या अपराधिक काम समाज से, कानून से, जनता से छिप नहीं सकेगा। किसी भी कार्य में भ्रष्टाचार का विरोध न किया जाना, तब की सरकार में भी गलत था, आज की सरकार में भी गलत है। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार के नाम पर यह सभी सरकारें एक दूसरे से सहमत हैं और आगे भी रहेंगी। मेरे ख्याल से अब ऐसी सरकार आवे जो जनता को कानून का आभास करावे और भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त न कर पाए तो इसके प्रति अपना कोई ठोस कार्य तो करें ॥ जय भारत ! जय जय जय !

इसी विषय पर बृजेश सिंह ने चर्चा की और विचारों को उत्तम बताया फिल्म उनके विचारों का जवाब हमने इस प्रकार दिया देखें और समझें >>
Brijesh Singh जी, जैसा की मैंने अभी देश की विभिन्न यात्राओं में कानपुर से लेकर कोलकाता तक और कानपुर से लेकर के उड़ीसा तक और इसके आस-पास जो हमने देखे। जो हमने इमारतें देखी, जो हमने विकास देखें, वह आज के नही दिखे। अभी के नहीं दिखे। वह सभी विकास कार्य आज से 30 साल पहले या 15 साल पहले याकोई 10 साल पहले का, मेरा मतलब जो भी उम्र का है, वैसा विकास दिखा। लेकिन कहीं भी नवीनतम विकास हमको नहीं दिखा। यह ऐसा महसूस होता है कि जैसे यह 5 साल हमारे मिट्टी में चले गए। देश को यह जो अभी मोदी जी द्वारा आते ही लागू की गई नोटबंदी से भी कोई लाभ नहीं मिला। आप कहोगे की डुप्लीकेट करेंसी, तो वो आज भी है। यह तो सामाजिक अपराध है, यह बराबर, हर समय, हर शासन में रहते हैं। इनको नियंत्रण करने की क्षमता शासन में हो, बस वही शासन होता है। रह गई बात की अगर सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह की सरकार को पीछे से चला रही थी, तो आज मोदी जी की सरकार को भी RSS चला रहा है और देश में जो SC/ST के नाम से हिंदुओं के बीच में जो आपसी भाईचारा था, उसको भी कुछ संगठन या उनके किसी दूसरे संगठनों के द्वारा समान्य बनाम SC/ST करके प्रचारित किया गया और इनके बीच एक खाई तैयार कर दी गई ।विकास आज भी विकास की बाट जोह रहा है, उसका कोई पुरसाहाल नहीं है। अगले 5 साल भी इनको दे दो, कुछ होने हवाने वाला नहीं है। देश जहां है, वही है। आज जब हम अपने आसपास जो समस्याएं देखते हैं वह 10 साल पहले भी थी, 5 साल पहले भी थी, आज भी है। भ्रष्टाचार पिछले 10 सालों से चरम पर है। इसका कोई भी ऐसा उपाय नहीं है कि राज्य स्तर पर कोई ऐसा उपाय किया जाए जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग सके। यही हमारा कहना है कि हमारे पास विकल्प ही नहीं है और हमारे पास इनका संकल्प भी नहीं है ।मौके के अनुसार, समय की नजाकत को देखते हुए, देश हित में ही कोई निर्णय लिया जाए, वही उचित होगा।

आनलाइन भ्रष्टाचार-रेलवे R.P.F.

आनलाइन भ्रष्टाचार--- रेलवे ऑनलाइन खरीदारी के तर्ज पर ऑनलाइन रिश्वत का भी मामला आज प्रकाशित हुआ है। विदित हो कि राजधानी एक्सप्रेस में आरप...