Friday, May 31, 2019

नई सरकार और धार्मिक अपेक्षाएं

आज जब देश में प्रजातंत्र के आधार लोकसभा में नई सरकार के गठन के लिए महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। कल आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में मोदी जी के साथ साथ उनके सहयोगी मंत्रियों को भी शपथ दिलाई गई। अभी शपथ के साथ देश में एक नई सरकार का आगाज हो गया और नरेंद्र मोदी जी के इच्छा के अनुसार सहयोगी मंत्रियों को विभागों का आवंटन करने के बाद सरकार अपना कार्य करना प्रारंभ कर देगी। पुराने लोगों की नई सरकार होगी। नए लोगों को भी नई सरकार होगी। नए लोगों में नई उमंग होंगे। पुराने लोग अपने हिसाब से काम कर रहे होंगे।

नई सरकार के लिए, जाहिर सी बात है इस टर्म मे नए ढंग का और कुछ नया ही होना चाहिए। यह हम सोच रहे हैं तो वहां आने वाले कैबिनेट मंत्री, प्रधानमंत्री, उनके नीतियों के विशेषज्ञ लोग, सब मिलकर कुछ न कुछ ऐसा जरूर सोच रहे होंगे कि हम कुछ अलग हटके करेंगे। सबसे पहली बार जो इस भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बहुमत मिला है वह धार्मिक आधार पर मिला है। तथाकथित पार्टी के कार्यकर्ताओं और समाज के ठेकेदारों ने, धर्म के दलालों ने, आम जनता के मन में, हिंदू धर्म खत्म होने का इतना बड़ा भय पैदा कर दिया था कि हर जनमानस यह सोचने के लिए मजबूर हो गया था कि क्या दस-बीस साल में यह हिंदू धर्म खत्म हो जाएगा। किसी ने भी यही नहीं सोचा कि आज बीते हुए दो चार हज़ार सालों में कोई हिंदू धर्म को खत्म नहीं कर पाया है और मैं दावा करता हूं कि आगे भी कोई भी धर्म को खत्म नहीं कर पाएगा।

 धार्मिक बैंक के आगे और धार्मिक कट्टरता की प्रबलता के लिए हिंदू धर्म के अनुयाई आम जनता यह भूल बैठे कि नहीं कट्टर लोगों ने हमको विभिन्न श्रेणियों में बांटकर के नीच होने का दर्जा दिया है। जो खुद एक नहीं हो सकते हैं वह वाला इस देश की रक्षा क्या करेंगे ? बांटने वाले लोग भी क्या कभी किसी को एक किया करते हैं। सबवे किसी को नीचा किसी को ऊंचा बताने वाले लोग उनके अनुसार नीच लोग को क्या वह गले लगा पाएंगे, ऐसा सम्भव नहीं है।

अब देखना यह होगा कि मौजूदा भारतीय जनता पार्टी सरकार कितने अच्छे ढंग से युवाओं में धर्म के प्रति निष्ठा पैदा करती है। यह निष्ठा तभी पैदा हो सकती है जब हम दूसरे धर्म से अपनी तुलना करें। इसके लिए पहले हमें उनसे संघर्ष करना होगा तभी उनसे अपने को श्रेष्ठ साबित करना होगा। अपने को मजबूत साबित करना होगा जो दूसरे के ऊपर शक्ति प्रदर्शन करके ही साबित हो सकता है। और तमाम धर्म से संबंधित बातें हैं जिन पर गौर करना होगा तभी यह धर्म मजबूत होगा। इसी धर्म को मजबूत करते-करते कहीं इतना न मजबूत कर देना कि यह धर्म भी दूसरों की तरह बदनाम हो जाए।

जय भारत !
जय जय जय !

#विनोद सचान 

Thursday, May 30, 2019

शहादत से सरकार तक...

सैनिकों के नाम पर थोथी राजनीति करने वालों ने यह नहीं सोचा कि हम पुलवामा हमले में शहीद हुए तमाम सैनिकों के परिजनों को, आज देश की नई सरकार के गठन के मौके पर बुलाया जाए।

भाजपा के मोदी, मोदी की भाजपा जो भी कहो, उनकी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति भवन  नई दिल्ली में आयोजित किया गया है। इस समारोह में देश के अंदर से लोगों को चुन-चुन कर बुलाया गया है और देश के बाहर से विदेशी मेहमानों को आमंत्रित किया गया है। यह समारोह कहां तो जाता है सादगी पसंद बड़े ही हल्के माहौल में प्रसन्नचित्त होकर के संपन्न कराया जाएगा। देखिए मौके में क्या होता है इसे हम सब बाद में समझ पाएंगे। आइए तब तक इन आयोजन से संबंधित कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जाए।

देश के लोकसभा चुनाव के पूर्व जम्मू कश्मीर राज्य के पुलवामा में भारतीय सीमा सुरक्षा बल के जवानों से भरी हुई एक बस को एक कार से टकराकर विस्फोट कर दिया गया था। इस बस के चिथड़े उड़ गए थे और हमारे काफी जवान शहीद हो गए थे। सीमा पर सेवा देने वाले यह जवान अपनी ड्यूटी के लिए जा रहे थे। लेकिन आतंकी गतिविधि के कारण शहीद हुए जवानों को, देश में सदमे के रूप में देखा गया I पूरा देश अवाक रह गया और इस घटना की चारों तरफ निंदा होने लगी पाकिस्तान और घटना की जिम्मेदारी लेने वाले जैस संगठन की मुखालफत होने लगी। पूरा देश एक सुर में अब पाकिस्तान से या जैस संघठन पर हमला करने की मांग होने लगी। चुनाव का माहौल था सरकार के पास मुद्दा था और सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान के अंदर घुसकर की। परिणाम जो भी आया, हम आप सभी लोग उससे वाकिफ हैं। अब इस जगह वही सवाल उठाया गया है कि देश की सीमा में रात दिन सेवा देने वाले यह जवान, जब शहीद हो जाते हैं, तो उनके घर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। इन जवानों को पेंशन नहीं दी जाती है। इन जवानों के शहीद होने पर इनके घर तक संवेदना ओं का जाहिर करने का कार्यक्रम क्षेत्रीय नेताओं द्वारा किया गया और फिर इसके बाद इस हमले का धीरे-धीरे लोग चुनाव के कारण भूलने से लगे। और अब अभी लगता है किस शपथ लेने वाले लोग इन शहीदों को या इनके परिवार को भूल गए क्योंकि इसका अखबारों सहित कहीं भी उल्लेख नहीं आया कि शहीदों के परिजनों को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया है।

लोकसभा के चुनाव में चुनाव आयोग के निर्देशों के बावजूद कि सेना का उल्लेख प्रचार में नहीं किया जाएगा, किंतु भाजपा द्वारा या भाजपा के नरेंद्र मोदी द्वारा मंच से इस घटना का उल्लेख किया गया। यहां तक कि इन सैनिकों की शहादत के नाम पर वोट मांगे गए। वोट पड़े और भाजपा या नरेंद्र मोदी जी की भारी बहुमत से जीत हुई। जाहिर सी बात है कि यदि जीत होनी है तो सरकार भी बननी है। जब सरकार बनेगी तो शपथ ग्रहण समारोह भी होगा। अभी शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा द्वारा अभी हाल के चुनाव में देश के विभिन्न हिस्सों में मारे गए कार्यकर्ताओं के परिजनों को निमंत्रण दिया गया है। कार्यकर्ताओं को बुलाया गया है और समाज के विशिष्ट लोगों को आमंत्रित किया गया है।

यदि शपथ ग्रहण समारोह में सैनिकों के नाम पर वोट मांग कर सरकार बनाने वाले मोदी जी ने उन शहीद सैनिकों के परिजनों को याद नहीं किया है यानी शपथ समारोह में नहीं बुलाया है तो यह समझा जाना चाहिए कि लोगों ने उनको भुलाने की कोशिश की है।

Monday, May 27, 2019

ऐसा समाचार संदेश आपको क्या देगा ?

आज मीडिया चाहे इलेक्ट्राट्रानिक मीडिया हो या चैनल या अखबार, जिस स्तर पर खड़ी है। उससे यह लगता है कि देश की जनता के साथ लगातार मजाक किया जा रहा है। मजे की बात यह है एक ही अखबार में समाचार और विद्ववतापूर्ण लेख की लेखन मे विरोधाभास होने के साथ-साथ बड़े ही तीखे ढंग से एक पार्टी की तरफ से दूसरी पार्टी के ऊपर किया गया है। ऐसा महसूस हो रहा है कि जैसे यह संपूर्ण अखबार सीधे-सीधे सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी को समर्थन कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह अब जनता के लिए ना हो करके और स्वतंत्र लेखन न करके मात्र एक पार्टी का मुखपृष्ठ बन गया है। ऐसी हालातों में निष्पक्ष समाचारों का पाना बहुत ही मुश्किल हो गया है।

आइए देखते हैं की दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ संख्या 3 में चुनावी रंजिश में हुई पूर्व प्रधान की हत्या नामक शीर्षक के तहत समाचार लिखा गया है। इसी में यह लिखा गया है कि पुलिस द्वारा बताया गया जांच में पाया गया कि पूर्व प्रधान की हत्या प्रधानी चुनाव की रंजिस में किया गया। आइए देखते हैं कि दैनिक जागरण ने क्या लिखा है--


अब दूसरी तरफ इसी अखबार का पक्षपाती रुख देखते हैं जो उसने अपने संपादक की में लिखा है--
हसवा नेहा पर पूर्ण प्रधान सुरेंद्र सिंह को भाजपा का कार्यकर्ता बताते हुए उसकी बड़ाई में तमाम चार चांद लगाए हैं। इसी मामले को गांधी जी के गांधीवाद से तुलना कर दिया गया है। इतना में तमाम तरीके के सवाल उठाए गए हैं। बजाय कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने के गांधीवाद को दोषी बनाया गया है। और देखे क्या और कैसा लिखा गया है--


अजब हम अपने सामने एक ही तारीख में एक ही समस्या का बराबर प्रहार किया जाना और एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में समाचार का रखा जाना अच्छा नहीं लग रहा है। समाचार में साफ उसने कहा है कि पूर्व प्रधान सुरेंद्र सिंह का मर्डर पूर्व की प्रधानी की रंजिश में किया गया है यानि अब इसमें कुछ ढूंढने और समझने लायक नहीं बचा है। यह सच भी है कि प्रधानी के समय से ही आपस में रंजिश चला करती है कोई इस पार्टी में शामिल हो जाता है तो दूसरा उसकी विपक्ष की पार्टी में शामिल हो जाता है। यही सुबह हो जाता है एक दूसरे को नीचा दिखाने का काम । जाहिद सी बात है कि जीता हुआ व्यक्ति जरूर-जरूर अपने सामने वाले विपक्षी को तमाम प्रकार से पताणित करने की कोशिश करेगा। इसी कोशिश में रंजिश पति आती है और एक दूसरे पर जानलेवा हमला करने लगते हैं।

अखबार अपने संपादकीय में समाचार छपने के बाद भी यह तय नहीं कर पाए कि प्रधान की मौत किस कारण हुई है। जबकि पुलिस के रिपोर्ट में साफ है कि अभी तक जो सामने आया है उसके अनुसार प्रधानी के चुनाव की रंजिश है। आज गांधीवाद के सवाल उठाने वाले इस अखबार ने यह नहीं कहा कि गोडसे ले गांधीजी की सरेआम जान ले ली थी। तब या तो यह अख़बार था नहीं या फिर यह लोग जानबूझकर के जनता में एक अलग झूठा और गलत तरह के मुद्दे को जिंदा करना चाहते हैं।

इस संपादक को यह देखना चाहिए कि हत्या इंसान की होती है। इसमें न तो गांधीवाद की होती है, न ही गोडसे वाद की होती है। यहां साफ जाहिर है कि मरता केवल इंसान है और मारने वाले भी होते तो इंसान है लेकिन उनमें इंसानियत नहीं रह जाती है। मैं अपने विद्वान संपादक और विद्वान संवाददाताओं से यह प्राथना करूंगा और यह चाहूंगा कि आप अपनी विश्वनीयता काम करने के लिए, अपने आपको इस राजनीति के चक्कर से अलग रखते हुए अच्छे प्रयास करें।

///// विनोद सचान /////

27-05-2019 बात करने पर आपत्तियां

कितना अजीब लगता है कि लोग अब बोलने भी नहीं देते किसी को I लोगों को अपने हार का प्रलाप भी नहीं करने देते हैं। जाहिर सी बात होती है कि जब भी आदमी अंदर से घायल होता है या कोई उसे आंतरिक तकलीफ होती है तो उसे मानसिक रूप से संतुलित होने के लिए कुछ अपने विचार प्रकट करने पड़ते हैं और कुछ दूसरों के सुनने पड़ते हैं। चूकि जब अंदर भरे हुए अपनी बातों को वह प्रकट नहीं कर लेता, तब तक उसको आत्मिक संतोष नहीं मिलता है। जब कभी वह दो चार लोगों के बीच में बैठेगा और जो उन्हें अपने लगेंगे तो उनसे अपनी व्यथा को या अपने आंतरिक कष्ट को व्यक्त करेगा।

अभी हाल में ही लोकतंत्र के लोकसभा के सदस्य पद के चुनाव कराए गए। लड़ने वाले बहुत होते हैं। उनमें से कुछ अच्छी पार्टी के होते हैं, कुछ खराब पार्टी के होते हैं या कुछ धनाढय पार्टी के होते हैं तो कोई निर्धन पार्टी को होते हैं। तमाम तो उनमें निर्दलीय होते हैं। जिनका कोई गल नहीं होता है जो अपने को प्रदर्शित करते हैं। इस बार लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेश और गठबंधन (यानी सपा और बसपा दोनों मिलकर) के प्रत्याशियों बीच था।

चुनाव हुआ। जनता ने अपने वोटों का इस्तेमाल करके जिसे चाहा, उसको जिताने के क्रम में कार्य किया। जनता ने चुना या किसी और ढंग से चुना गया। मतगणना जब हुई तो पूरे देश से भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। क्योंकि पहले से ही भारतीय जनता पार्टी के दोनों नेता गठबंधन को बुरी तरीके से निशाना बनाए हुए थे और घबरा ऐसा रहे थे। तमाम नागरिक यदि भाजपा के साथ था तो गठबंधन के साथ भी कम नहीं था। किंतु भारी बहुमत से जीत होने के कारण लोगों के दिमाग में कुछ न कुछ तो आना ही था और हारने वालों को भी अपने होने वाली जीत से बिछड़ कर, कुछ न कुछ तो प्रलाप करना ही था।

भारतीय जनता पार्टी बहुमत से देश में जीती। स्थानीय संसद सदस्य की सीट से भी भाजपा का ही प्रत्याशी भारी अंतर से जीता। भारतीय जनता के बाद दूसरे नंबर पर गठबंधन का ही प्रत्याशी था। प्रदेश की बहुतायत संसद सदस्य क्षेत्रों में गठबंधन का ही प्रत्याशी दूसरी पंक्ति पर खड़ा नजर आया है। तीसरे नंबर पर आने वाले प्रत्याशी को ज्यादा माथापच्ची नहीं करना होता है और न ही ज्यादा जवाब देना होता है। पब्लिक देख लेती है और शांत हो जाती है, कुछ सवाल भी नहीं करती है। लेकिन दूसरे नंबर पर गठबंधन के प्रत्याशी को उनके पदाधिकारियों को और उनके समर्थकों को आपस में चर्चा करनी ही पड़ती है। वैसे तो जीते हुए दल भाजपा के लोग भी चर्चा करेंगे तो गठबंधन की ही करेंगे। बात करने के लिए कुछ ना कुछ तो मुद्दों को सहारे के लिए किसी को चुनना होगा। इस बार के चुनाव में अधिकतर ईवीएम ही निसाने पर रही।

वोट पड़ने के पहले भी ईवीएम के संबंध में चुनाव आयोग को कई बार विपक्षी दलों द्वारा एक होकर के हटाने के लिए कहा गया था। लेकिन चुनाव आयोग द्वारा इनके आवेदन को नकार दिया गया और तब यह सभी दल मिलकर के भारत के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट गए। वहां से भी कोई वाजिब सहयोग नहीं मिल सका। सहयोग न मिलने के कारण अब चुनाव आयोग की मर्जी थी तो चुनाव आयोग ने ईवीएम के द्वारा ही वोट कराएं। चुनाव होने के बाद प्रदेश में कई जगह प्राइवेट वाहनों में ईवीएम का पाया जाना जनता के मन में भ्रम को भरने लगा। कई प्रत्याशी तो ईवीएम की रक्षा के लिए दो-तीन रात गिनती स्थल पर डटे रहे।


हारे हुए लोग अब अपने हारने का दोष जनता को तो दे नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि हमारा वोट हमको मिला है। अब बात करने के लिए बचता है तो केवल यही कहा जा सकता है कि कुछ तो था तो कुछ नही, ईवीएम हीं आती है। हम लोग ही भी हमको तरह तरह से दोष देने लगे। लेकिन दूसरे लोगों को यह सुनना भी गवारा नहीं हो रहा था। आप कहीं भी बात करो तो दूसरे समूह के लोग जिन्होंने भाजपा को समर्थन दिया है वह लोग उसका विरोध तुरंत करने लगते हैं।

वोटिंग की गणना के बाद बस में यात्रा कर रहे लोग और बस का परिचालक भी गठबंधन का समर्थक होने के कारण लगातार अपने कन्नौज क्षेत्र से संपर्क बनाए हुआ था। बस परिचालक द्वारा यह पूछने पर कि यहां पर किसकी जीत हुई है तो एक सहयात्री में मोदी के समर्थन और बहुमत की बात करते हुए बताया कि यहां से देवेंद्र सिंह भोले की जीत हुई है। उधर कन्नौज की सीट में उलझे हुए परिचालक ने अपना मत जाहिर करते हुए कहा कि जरूर कुछ न कुछ बेईमानी की गई है, तभी यह जीत हासिल हुई है। अब फिर बात आई तो दोष इवीएम पर ही दिया गया। भाई अब इस समय इस चुनाव में विश्लेषण में केवल और केवल ईवीएम ही ऐसी है जिस पर दोष डाल करके पूरी जिम्मेदारी से बचा जा सकता है। ईवीएम को दोषी कहने पर भाजपा समर्थक यात्री के ऊपर पता नहीं क्या प्रक्रिया हुई, लगातार उसने बार-बार तेज आवाज मे ईवीएम के पक्ष मे बात करना शुरू कर दिया। बस में अब बिल्कुल शांति थी, न कोई हां कहने वाला था और न ही कोई न कहने वाला था। थोड़ी देर की बड़बड़ाहट के बाद वह ईवीएम के समर्थक सज्जन चुप हो गए।

अभी एक दिन पूर्व की ही तो बात है एक दुकान में फिर वही हार-जीत और समीक्षा की बात चल रही थी। फिर लोगों ने एर-घेर के दोष ईवीएम पर ही रखना शुरू कर दिया। अब तो ईवीएम के संबंध में मुझे भी कुछ कहना पड़ा और सभी लोगों ने एक सुर पर ईवीएम को दोष देना शुरू कर दिया। उन भाजपा पदाधिकारी महोदय से रहा नहीं गया और उन्होंने बीच में ही टोंक दिया और तमाम बात बताने लगे। बाद में से यही कहा गया आप शांत रहिए। बात चल रही है चलने दीजिए। आप सभी लोग चर्चा से विलग हो गए।
तो ऐसा लगा,

क्या लोग अब आप हो या हम हो या जनता को या इस देश के नागरिक को या सताए हुए लोगों को या दुखी हुए लोगों को---
क्या बात भी नहीं करने देंगे ?
क्या विचार-विमर्श भी नहीं करने देंगे ?
क्या सोचने भी नहीं देंगे ?
क्या समझने भी नहीं देंगे ?
ऐसा ही लोगों को कौन सा अधिकार है कि वह जबरदस्ती की बात करेंगे या किसी को बात नहीं करने देंगे ?
आखिर क्या लोग, इन लोगों के सामने बात अपनी जाहिर नहीं कर सकते ?

तमाम ऐसे सवाल हैं जो आज यह कह रहे हैं, ऐसा लगता है कि निरंकुशता का शासन आ गया है।

Wednesday, May 8, 2019


यहां पर बात यह हो रही है कि आज देश को सुधार की आवश्यकता है। विकास की ओर सकता है और मानव समाज की तमाम समस्याओं के खात्मे की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार समाप्त करने की आवश्यकता है। लोगों के जीवन स्तर को उठाने की आवश्यकता है।

लेकिन सत्ताधारी भाजपा और विपक्ष में रही कांग्रेस दोनों ने उपरोक्त सभी मुद्दों को छिपा दिया। एक दूसरे की बुराई करके ही इस देश को भरमाना चाहते हैं और शासन करना चाहते हैं। यहां न कोई देश के भले की बात कर रहा है और न ही इंसान के जीवन की रक्षा की बात कर रहा है और न ही सामाजिक विकास की बात कर रहा है। न ही देश में आधारभूत संरचनाओं के विकास की बात कर रहा है। कोई अपने सत्ता काल को दोबारा लाना चाहता है तो कोई खुद को सत्ता में लाना चाहता है। दोनों ही जनता की कमजोरी को पहचान गए हैं। एक तो धार्मिक उन्मादी लोग है जो जनता की मानसिक रूप से कमजोरी का फायदा उठाकर के सत्ता में कायम होना चाहते हैं। दूसरा भी कुछ कम नहीं, वह दूसरे समुदाय को अपना बना कर के, उनको सुरक्षा की गारंटी देना चाहता है। इसी के बहाने गद्दी में बैठना चाहता है।
यहां केवल बात चल रही है तो अपने स्वार्थ की चल रही है कोई न देश के लिए जी रहा है और न ही मर रहा है। यदि वह देश के लिए अपनी कुर्बानी बताता है तो आप समझ लेगा कि वह केवल अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर रहा है। अब तो ऐसा महसूस होने लगा है की कोई धर्म के भरोसे तो कोई अपने परिवारिक और खानदान के भरोसे केवल और केवल गद्दी का सपना देख रहे हैं।
इन्हीं के बीच में उत्तर प्रदेश से बसपा की मायावती और सपा के अखिलेश द्वारा समझौता कर लेने पर गठबंधन का नया फार्मूला तैयार हुआ। इनका भी यही उद्देश है कि किसी न किसी बहाने हमें सत्ता हथियाना चाहिए। गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में अपनी लड़ाई तो मजबूत की लेकिन प्रदेश के बाहर उनकी स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि केंद्र की सत्ता में अपना परचम लहरा सके। जाहिर सी बात है कि जनता द्वारा दिया गया गठबंधन को जनसमर्थन का उपयोग भाजपा के पूर्व बहुमत न मिलने पर, बनाने में काम आ सकता है। यह भी अपनी बात कहते हैं और यहां भी विकास का कोई मुद्दा हावी नहीं है।
भाजपा ने 1914 के पूर्व देश की समस्याओं को कम कांग्रेस की कमियों को ज्यादा उभारा। शुरू से लेकर के चुनाव खत्म होने तक केवल कांग्रेस को कोसते रहे और उसके साथ अपने कुछ विकास के नारे दिए थे। जनता से तमाम वादे किए थे, जिसमें इनका कोई भी वादा पूरा नहीं हुआ है। इनके बनने के बाद जनता के लिए कोई विशेष सहूलियते भी नहीं हुई है। तमाम तरीके की नियोजित और बगैर मूल्यांकन की चलने वाली योजनाएं भ्रष्टाचार का शिकार हो गई और जनता छली गई। यह जानते थे कि हम पिछले वह कोई भी वादा पूरी नहीं कर पाए हैं तो इन्होंने सेना के नाम का उपयोग चुनाव जीतने के लिए पूर्ण रूप से किया। मानसिक रूप से प्रभावित करने वाले यह लोग, विभिन्न प्रकार की बातें और आरोपों से लोगों के दिमाग में फिर से अपनी बात भरने लगे।
पांच वर्ष सत्ता में गुजारने के बाद आज भी इनके हाथ खाली हैं। इनके पास विकास नाम की कोई चीज नहीं है और चुनावी लाभ लेने के लिए किसान सम्मान योजना का चुनाव के पहले संचालित करना, देश के साथ एक बहुत बड़ी साजिश है।
कभी कांग्रेस को गाली देना, कभी उस राहुल गांधी को अंड संड बकना, तो कभी उनके परिवारिको को तमाम आरोप पढ़ कर के अपना नगमा बुलंद करना कुछ समझ में नहीं आता है।
कुछ लोग जानना चाहते हैं कि कांग्रेस ने देश के साथ क्या कर दिया है तो पहले उन्हें यह सोच लेना चाहिए कि पांच साल में भाजपा ने क्या कर लिया है। इन लोगों को जब कोई काम नहीं मिलता है तो उसके एवज में अंट- संट लिखने लगते हैं ताकि सोशल मीडिया में हतोत्साहित कर सके। न यह अच्छे-न वो अच्छे, तो क्या बुरे ही देश में शासन करेंगे। सबको लिखना होता है। सबकी अपनी मानसिक स्थिति होती है। सबका अपना लक्ष्य होता है। हर कोई किसी न किसी से प्रभावित होता है जब वह मानसिक रूप से ज्यादा जाकर जाता है तो उसका व्यवहार समाज में व इस सामाजिक मंच पर आतंकियों जैसा हो जाता है वह अपने आगे किसी दूसरे की बात न सुनना चाहता है और न ही समझना चाहता है।


आनलाइन भ्रष्टाचार-रेलवे R.P.F.

आनलाइन भ्रष्टाचार--- रेलवे ऑनलाइन खरीदारी के तर्ज पर ऑनलाइन रिश्वत का भी मामला आज प्रकाशित हुआ है। विदित हो कि राजधानी एक्सप्रेस में आरप...