Sunday, July 14, 2019

आनलाइन भ्रष्टाचार-रेलवे R.P.F.

आनलाइन भ्रष्टाचार---
रेलवे ऑनलाइन खरीदारी के तर्ज पर ऑनलाइन रिश्वत का भी मामला आज प्रकाशित हुआ है। विदित हो कि राजधानी एक्सप्रेस में आरपीएफ. के दो सिपाहियों आशीष चौहान और राम नयन यादव ने bsf जवान देवराम थापा से ₹ दस हजार घूस में ले लिए। ₹10000 नगद न होने पर सात हजार नकद और 3000/- रुपया Pay tm के माध्यम से सिपाही के खाते में भुगतान किया गया। देखिए आज की भष्टाचार की स्थिति कितनी भयावह और भय पूर्ण है कि नकद तो नकद अब आनलाइन भी घूस ली जा रही है।

मैं देवाराम थापा जी को बहुत ही धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होने देश की व्यवस्था को सुधारने में अपना महती योगदान दिया है। सरकारी विभाग में तमाम तरह से कमचारी और अधिकारी जनता के साथ खिलवाड़ कर के लगातार भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। रेलवे विभाग ने भी भ्रष्टाचार ऊंचाइयों तक है। रेलवे के पग-पग मे, हर कदम, हर जगह, भ्रष्टाचार लगातार किया जा रहा है। आज देव राम भाटी जी की गर्भवती पत्नी जब ट्रेन में नहीं  चढ़ पाइ तो उन्हें चेन पुलिंग करनी पड़ी। राजधानी एक्सप्रेस में एस्कॉर्ट के दोनों सिपाही उनके पास आए और उनसे तरह तरह की बातें करके, धमका कर, दस हजार रुपए मांगने लगे। देवाराम भाटी ने सिपाहियों को ₹7000 नगद और ₹3000 का भुगतान Pay tm से किया। इसके बाद उन्होंने उच्च अधिकारियों को अपने साथ होने वाले भ्रष्टाचार की शिकायत की। जहां दूसरे लोग इस तरीके की घटनाओं से और पुलिस से अपना पीछा छुड़ा करके, अपना कार्य या यात्रा जारी रखते है। वहां पर देव राम भाटी जी ने भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए अपनी पहल की। देव राम  भाटी जी बहुत ही प्रशंसा के पात्र है। हमारी उनको बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं। हम उनके साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं।

पूरे देश में विभिन्न ट्रेनों में जनरल डब्बे लगाए जाते हैं। जहां से ट्रेनें बनती है और जहां तक चलती है, इन जनरल यात्रियों के साथ सीट बेंच कर जबरजस्त पैसा वसूला जाता है। यात्रियों को तो अभी यात्रा करनी होती है और जयसे भी बनता है यात्रा करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। यात्री पैसा देकर चुपचाप अपने गन्तव्य को चला जाता है। बहुत ज्यादा ज्यादती होने पर भी, उसे अपने अकेले होने का भय भी सताता रहता है। वह हिम्मत ही नहीं कर पाता तमाम तरीके की कानूनी पचड़े में पड़ने की।
अब बारी सरकार की है कि सरकार इस भ्रष्टाचार के प्रकरण को ठीक से अध्ययन करते हुए और उचित निर्णय लेते हुए भ्रष्टाचारी लोगों को बर्खास्त कर, अच्छा सबक दिलाने का कार्य करेंगे। आज जनता में संदेश जाना चाहिए कि इस तरीके के भ्रष्टाचारी लोग अपने कार्य पद रहने लायक नहीं है।

जुर्म सहने की बजाए, यदि संघर्ष किया जाए, तो दूसरों के साथ कम से कम घटनाएं नहीं होंगी, जो हमारे साथ हो जाती है।

जय भारत !
जय जय जय ।

"विनोद सचान"



Thursday, July 11, 2019

यू.पी.बोर्ड द्वारा परीक्षा शुल्क ढाई गुना बढ़ाया जाना

यू.पी. बोर्ड द्वारा परीक्षा शुल्क बढ़ाया जाना---
माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा दसवीं और बारहवीं के परीक्षा शुल्क में ढाई गुना की बहुत की गई है जो कि अपने आपने बहुत ही शर्मनाक होगी। यूपी बोर्ड ने हाईस्कूल संस्थागत विद्यार्थी का शुल्क रु. ₹200.75 से बढ़ाकर  ₹500.75 का दिया है। हाईस्कूल व्यक्तिगत परीर्थी का शुल्क ₹306.00 से बढ़ाकर ₹706.00 कर दिया गया है। इसी क्रम में इंटरमीडिएट संस्थागत छात्र परीक्षा शुल्क ₹220.75 से ₹600.75 कर दिया गया है। इंटर व्यक्तिगत परीक्षार्थी का शुल्क ₹406.00 से बढ़ाकर ₹806.00 कर दिया गया है। अभी तक वैसे भी कमजोर और गरीब वर्ग के बच्चे शुल्क अदा करने में बहुत ही पीछे रहते थे। ग्रामीण क्षेत्र में तमाम ऐसे प्राइवेट विद्यालय हैं जो चैत के वादे में भी बच्चों को शिक्षा देते हैं।

प्राथमिक किससे बारवीं तक आने में लगभग कमजोर वर्ग का 40 प्रतिशत बच्चा शिक्षा से हट जाता है। शिक्षा व्यवस्था से इन कमजोर वर्ग के बच्चों का हट जाना बहुत ही दुखदाई है। अब उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा परीक्षा शुल्क का बढ़ाया जाना अपने आप में और जटिलता पैदा करेगा। जहां की ग्रामीण भारत शिक्षा जगत में अपनी पहचान खो रहा है। भूमि का बंटवारा होते-होते बड़े किसानों का लगभग सीमांत किसानों मे तब्दील हो जाना या आय का अन्य कोई साधन न होना आदि ग्रामीण नागरिकों का रहन-सहन ही नहीं बल्कि उनके बच्चों के गिरते शिक्षा स्तर के लिए भी जिम्मेदार है।

ऐसी स्थिति में जब कि गांव का व्यक्ति, अपने बच्चे की मासिक फीस भरने में सक्षम नहीं है और वार्षिक फीस भी उसे भरनी पड़ती है। एक दम से यू.पी. बोर्ड के द्वारा फीस को ढाई गुणा बढ़ा देना, अपने आप में बहुत ही दुखदाई साबित होगा। आज जहां ग्रामीण भारत में नागरिकों  की गिरती हुई आर्थिक स्थिति से सभी परिचित है फिर भी अनजान बन, एकदम से फीस बढाकर कमजोर वर्ग की कमर तोड़ दी गई है। ऐसा लगता है, जैसे सोची समझी साजिश के तहत कमजोर वर्ग को शिक्षा से वंचित करने के लिए एकदम से फीस बढ़ा दी गई है।

सबकी बात करने वालों को सोचना चाहिए कि हमारे कदम से कहीं ऐसा न हो कि कोई भी शिक्षा से वंचित रह जाए। ऐसा लगता है जैसे जानबूझकर भी सत्ता में बैठे लोग गरीबों को व उनके बच्चों के शैक्षणिक-सामाजिक- आर्थिक विकास को रोकने का कार्य कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाकर, चर्चा में रहने वाले लोग, आज हर छात्र से ज्यादा से ज्यादा धन उगाही करना चाहते हैं। मैं अपने मित्रों व समाज के लोगों से  आपेक्षा करता हूं कि यथाशीघ्र आंदोलन चलाकर इस फीस वृद्धि को वापस लेने के लिए  यू पी सरकार को मजबूर किया जाना चाहिए।

जय भारत !
जय जय जय !

विनोद सचान**

Saturday, July 6, 2019

देश का बजट

देश का बजट >>
देश में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ और इसे बजट या बजट पास करने के तरीके में खास तौर पर देखा जा सकता है। बहुत ही अथक प्रयास किए जा रहे हैं कि देश में परिवर्तन हो, किसी भी तरीके से परिवर्तन दिखे, लेकिन यह जो परिवर्तन है न, यह दिखने का नाम ही नहीं ले रहा है। लेकिन यह लोग भी पक्के हैं कैसे नहीं दिखेगा, इन्होंने कभी पढ़ा था, "करत करत अभ्यास ते", वहीं अभ्यास यह लगातार आज भी कर रहे हैं। इन्हें हो चाहे न हो लेकिन हमें उम्मीद है कि एक न एक दिन परिवर्तन अवश्य होगा। जब होगा तो दिखेगा, जरूर दिखेगा।

अब देख लीजिए, भाई पुरुषों का काम तो है नहीं घर की देखभाल करना और बार-बार पुरुष ही देश का बजट प्रस्तुत करें, यह थोड़ा भद्दा दिख रहा था। अरे भाई आज हर घर का मालिक स्त्री ही तो होती है। जब पूरे खर्चों का ध्यान रखती है, तो क्यों न बजट स्त्री ही प्रस्तुत करें। सो मोदी जी ने फट से जेटली जी को बताया और निर्मला सीतारमण जी को वित्त मंत्रालय थमाया। यह मिला जी भी देश की सीमाओं पर जाकर व्यवस्थाएं देख चुकी थी और देश की सुरक्षा की आवश्यकताओं को देख चुकी थी, सो भाई ! वह भी आ गई वित्त मंत्रालय में खर्चों का विश्लेषण करके बजट तैयार करने के काम में। तो पहला ही परिवर्तन यह हुआ कि देश की किसी पूर्ण कालिक महिला वित्त मंत्री ने देश का बजट प्रस्तुत किया।

देश का बजट पहले विदेशों जैसा ब्रीफकेस में प्रस्तुत किया जाता था, कितना भद्दा लगता था, अपने यहां का आदमी और अंग्रेजो जैसा ब्रीफकेस में बजट प्रस्तुत कर रहा था। इसमें भी काफी फर्क था कि काला आदमी और हाथ में ब्रीफकेस, तब देश का बजट I सभी विसंगतियों को दूर करते हुए मोदी जी ने अपनी घोषणाओं के अनुरूप नए अंदाज में प्रस्तुत कराया। लाल रंग की मखमली कपड़े में लिखते हुए बही खाते को हाथों में दबाए वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण ने लोकसभा में प्रस्तुत किया। वाकई परिवर्तन हुआ और बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ। इस इसके लिए मोदी जी बधाई के पात्र हैं।

 तमाम परिवर्तन तो यह अखबार करा देते हैं। सुबह-सुबह ही हिंदुस्तान पेपर दिमाग पर मोटे मोटे से लिख दिया अमीर पर कर, गरीब पर करम। अब दिमाग पर बनना शुरु हो गया कि लगता है, बजट बहुत ही अच्छा व सुहावना है। अब आगे महीन अक्षरों को पढ़ने की जरुरत ही नहीं रह जाती। जो ज्यादा महीन ताई के शब्द होते हैं, उन्हें पहले ही सरकार अपने पास रख लेती है। जागरण तो जाहिर है, जैसी सरकार, वैसा नारा लगाता है। उसने तो लिख दिया नये भारत की ओर। मैं अचकचा गया, दिमाग कहां था और कहां आ गया। मुझे तो लगता है इन्होंने लगाए पूरा जोर, परिवार का कोई चला जाए सांसद की ओर। अब सोच रहे थे, क्या पढ़े, सब कुछ अच्छा ही अच्छा है। यह अखबार वाले भी अच्छी खासी मति पलट देते हैं। समाचार से लाकर, प्रचार में अटका देते हैं।

 अपने को तो न बजट से फायदा होना था। न नुकसान होना था। न घाटे मे आना था। न कहीं दूर तक जाना था। सो मोटिया टाइप का पढ़ लिया, और दिमाग में बैठा लिया, भला सेठों का ही होना है। अभी चुनाव तो हैं नहीं, जो जनता के हुक्का पानी पर रहम करेगा या उसकी रोटी कपड़ा और मकान की व्यवस्था करेगा।

चाहे जैसा भी कह लो,
तुम्हारा बजट बेईमानी है।
यदि भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा,
तो विकास एक कहानी है ॥

जय भारत !
जय जय जय !
"विनोद सचान ''

Friday, June 28, 2019

सत्ता का मद

जब तक राजनीतिक नहीं चाहता है तब तक अधिकारी गलत नहीं होता है। हर विभाग से महीने में लिफाफा ऊपर की तरफ चलता है। ऊपरवाला बिक जाता है, उनके नीचे वाला पहलवान हो जाता है। ऊपरवाले उसके कदरदान और फिक्र करने वाले हो जाते हैं।
 ठीक है आप राजनीतिक हैं या जन सेवक हैं याद समाज सेवक है तो इसका मतलब थोड़ा है कि अधिकारी को मारेंगे । कानून को फुटबॉल बनाएंगे। कानून राजनीतिक आदमी के हाथ का कठपुतली बन जाएगा। कुल मिलाकर के आप सत्ता मैं नहीं, जनता में अपना भैय पैदा करना चाहते हैं। और उस भय को सही भी ठहराना चाहते हैं। जिस संविधान की शपथ ले करके आप विधायक या सांसद बनते हैं। उसी संविधान से खेलना चाहते हैं। आप अपनी बात कहिये या आप सरकारी की शिकायत ऊपर वाले अधिकारी से करिये। लेकिन अधिकारी हो या जनता या अपराधी भी हो तब भी आपसे मारने के हकदार नहीं है I इन सभी के लिए स्थानीय स्तर पर पुलिस की व्यवस्था की गई है। पुलिस में जाइए I उसकी शिकायत करिए और तमाम रास्ते हैं, जिससे आप सरकारी कर्मचारी पर काम न करने का, उसे दंड दे सकते हो।
 भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस हो या हिंदू के नाम पर कोई संगठन हो या कोई विपक्षी संगठन हो या किसी जात के नाम पर संगठन हो, किसी को देश में आरजकता फैलाने की अनुमति नहीं है। कोई भी पार्टी नही कहती है और न ही चाहती है कि उसके नाम पर किसी का अपमान किया जाए या किसी को मारा पीटा जाए या उसे किसी अन्य तरीके से प्रताडि़त किया जाए। लोगों को चाहिए कि अपने अंदर के शैतान को दावे और दूसरे जीवित को या सामने वाले को भी अपने जैसा इंसान माने, तभी बात बनने वाली है।
आज का मीडिया भी पार्टी, सत्ता और सबसे पहले अपना लाभ देखकर, समाचार छापता है या समाचार को दिखाता है। यानी देश की तमाम बातें तो समाज के सामने आ ही नहीं पाती।
 तो यह न सोचा जाए कि सरकारी आदमी ही काम चोर होता है या गलत होता है।
 जय भारत !
जय जय जय !
विनोद सचान

Friday, May 31, 2019

नई सरकार और धार्मिक अपेक्षाएं

आज जब देश में प्रजातंत्र के आधार लोकसभा में नई सरकार के गठन के लिए महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। कल आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में मोदी जी के साथ साथ उनके सहयोगी मंत्रियों को भी शपथ दिलाई गई। अभी शपथ के साथ देश में एक नई सरकार का आगाज हो गया और नरेंद्र मोदी जी के इच्छा के अनुसार सहयोगी मंत्रियों को विभागों का आवंटन करने के बाद सरकार अपना कार्य करना प्रारंभ कर देगी। पुराने लोगों की नई सरकार होगी। नए लोगों को भी नई सरकार होगी। नए लोगों में नई उमंग होंगे। पुराने लोग अपने हिसाब से काम कर रहे होंगे।

नई सरकार के लिए, जाहिर सी बात है इस टर्म मे नए ढंग का और कुछ नया ही होना चाहिए। यह हम सोच रहे हैं तो वहां आने वाले कैबिनेट मंत्री, प्रधानमंत्री, उनके नीतियों के विशेषज्ञ लोग, सब मिलकर कुछ न कुछ ऐसा जरूर सोच रहे होंगे कि हम कुछ अलग हटके करेंगे। सबसे पहली बार जो इस भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बहुमत मिला है वह धार्मिक आधार पर मिला है। तथाकथित पार्टी के कार्यकर्ताओं और समाज के ठेकेदारों ने, धर्म के दलालों ने, आम जनता के मन में, हिंदू धर्म खत्म होने का इतना बड़ा भय पैदा कर दिया था कि हर जनमानस यह सोचने के लिए मजबूर हो गया था कि क्या दस-बीस साल में यह हिंदू धर्म खत्म हो जाएगा। किसी ने भी यही नहीं सोचा कि आज बीते हुए दो चार हज़ार सालों में कोई हिंदू धर्म को खत्म नहीं कर पाया है और मैं दावा करता हूं कि आगे भी कोई भी धर्म को खत्म नहीं कर पाएगा।

 धार्मिक बैंक के आगे और धार्मिक कट्टरता की प्रबलता के लिए हिंदू धर्म के अनुयाई आम जनता यह भूल बैठे कि नहीं कट्टर लोगों ने हमको विभिन्न श्रेणियों में बांटकर के नीच होने का दर्जा दिया है। जो खुद एक नहीं हो सकते हैं वह वाला इस देश की रक्षा क्या करेंगे ? बांटने वाले लोग भी क्या कभी किसी को एक किया करते हैं। सबवे किसी को नीचा किसी को ऊंचा बताने वाले लोग उनके अनुसार नीच लोग को क्या वह गले लगा पाएंगे, ऐसा सम्भव नहीं है।

अब देखना यह होगा कि मौजूदा भारतीय जनता पार्टी सरकार कितने अच्छे ढंग से युवाओं में धर्म के प्रति निष्ठा पैदा करती है। यह निष्ठा तभी पैदा हो सकती है जब हम दूसरे धर्म से अपनी तुलना करें। इसके लिए पहले हमें उनसे संघर्ष करना होगा तभी उनसे अपने को श्रेष्ठ साबित करना होगा। अपने को मजबूत साबित करना होगा जो दूसरे के ऊपर शक्ति प्रदर्शन करके ही साबित हो सकता है। और तमाम धर्म से संबंधित बातें हैं जिन पर गौर करना होगा तभी यह धर्म मजबूत होगा। इसी धर्म को मजबूत करते-करते कहीं इतना न मजबूत कर देना कि यह धर्म भी दूसरों की तरह बदनाम हो जाए।

जय भारत !
जय जय जय !

#विनोद सचान 

Thursday, May 30, 2019

शहादत से सरकार तक...

सैनिकों के नाम पर थोथी राजनीति करने वालों ने यह नहीं सोचा कि हम पुलवामा हमले में शहीद हुए तमाम सैनिकों के परिजनों को, आज देश की नई सरकार के गठन के मौके पर बुलाया जाए।

भाजपा के मोदी, मोदी की भाजपा जो भी कहो, उनकी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति भवन  नई दिल्ली में आयोजित किया गया है। इस समारोह में देश के अंदर से लोगों को चुन-चुन कर बुलाया गया है और देश के बाहर से विदेशी मेहमानों को आमंत्रित किया गया है। यह समारोह कहां तो जाता है सादगी पसंद बड़े ही हल्के माहौल में प्रसन्नचित्त होकर के संपन्न कराया जाएगा। देखिए मौके में क्या होता है इसे हम सब बाद में समझ पाएंगे। आइए तब तक इन आयोजन से संबंधित कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जाए।

देश के लोकसभा चुनाव के पूर्व जम्मू कश्मीर राज्य के पुलवामा में भारतीय सीमा सुरक्षा बल के जवानों से भरी हुई एक बस को एक कार से टकराकर विस्फोट कर दिया गया था। इस बस के चिथड़े उड़ गए थे और हमारे काफी जवान शहीद हो गए थे। सीमा पर सेवा देने वाले यह जवान अपनी ड्यूटी के लिए जा रहे थे। लेकिन आतंकी गतिविधि के कारण शहीद हुए जवानों को, देश में सदमे के रूप में देखा गया I पूरा देश अवाक रह गया और इस घटना की चारों तरफ निंदा होने लगी पाकिस्तान और घटना की जिम्मेदारी लेने वाले जैस संगठन की मुखालफत होने लगी। पूरा देश एक सुर में अब पाकिस्तान से या जैस संघठन पर हमला करने की मांग होने लगी। चुनाव का माहौल था सरकार के पास मुद्दा था और सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान के अंदर घुसकर की। परिणाम जो भी आया, हम आप सभी लोग उससे वाकिफ हैं। अब इस जगह वही सवाल उठाया गया है कि देश की सीमा में रात दिन सेवा देने वाले यह जवान, जब शहीद हो जाते हैं, तो उनके घर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। इन जवानों को पेंशन नहीं दी जाती है। इन जवानों के शहीद होने पर इनके घर तक संवेदना ओं का जाहिर करने का कार्यक्रम क्षेत्रीय नेताओं द्वारा किया गया और फिर इसके बाद इस हमले का धीरे-धीरे लोग चुनाव के कारण भूलने से लगे। और अब अभी लगता है किस शपथ लेने वाले लोग इन शहीदों को या इनके परिवार को भूल गए क्योंकि इसका अखबारों सहित कहीं भी उल्लेख नहीं आया कि शहीदों के परिजनों को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया है।

लोकसभा के चुनाव में चुनाव आयोग के निर्देशों के बावजूद कि सेना का उल्लेख प्रचार में नहीं किया जाएगा, किंतु भाजपा द्वारा या भाजपा के नरेंद्र मोदी द्वारा मंच से इस घटना का उल्लेख किया गया। यहां तक कि इन सैनिकों की शहादत के नाम पर वोट मांगे गए। वोट पड़े और भाजपा या नरेंद्र मोदी जी की भारी बहुमत से जीत हुई। जाहिर सी बात है कि यदि जीत होनी है तो सरकार भी बननी है। जब सरकार बनेगी तो शपथ ग्रहण समारोह भी होगा। अभी शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा द्वारा अभी हाल के चुनाव में देश के विभिन्न हिस्सों में मारे गए कार्यकर्ताओं के परिजनों को निमंत्रण दिया गया है। कार्यकर्ताओं को बुलाया गया है और समाज के विशिष्ट लोगों को आमंत्रित किया गया है।

यदि शपथ ग्रहण समारोह में सैनिकों के नाम पर वोट मांग कर सरकार बनाने वाले मोदी जी ने उन शहीद सैनिकों के परिजनों को याद नहीं किया है यानी शपथ समारोह में नहीं बुलाया है तो यह समझा जाना चाहिए कि लोगों ने उनको भुलाने की कोशिश की है।

Monday, May 27, 2019

ऐसा समाचार संदेश आपको क्या देगा ?

आज मीडिया चाहे इलेक्ट्राट्रानिक मीडिया हो या चैनल या अखबार, जिस स्तर पर खड़ी है। उससे यह लगता है कि देश की जनता के साथ लगातार मजाक किया जा रहा है। मजे की बात यह है एक ही अखबार में समाचार और विद्ववतापूर्ण लेख की लेखन मे विरोधाभास होने के साथ-साथ बड़े ही तीखे ढंग से एक पार्टी की तरफ से दूसरी पार्टी के ऊपर किया गया है। ऐसा महसूस हो रहा है कि जैसे यह संपूर्ण अखबार सीधे-सीधे सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी को समर्थन कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह अब जनता के लिए ना हो करके और स्वतंत्र लेखन न करके मात्र एक पार्टी का मुखपृष्ठ बन गया है। ऐसी हालातों में निष्पक्ष समाचारों का पाना बहुत ही मुश्किल हो गया है।

आइए देखते हैं की दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ संख्या 3 में चुनावी रंजिश में हुई पूर्व प्रधान की हत्या नामक शीर्षक के तहत समाचार लिखा गया है। इसी में यह लिखा गया है कि पुलिस द्वारा बताया गया जांच में पाया गया कि पूर्व प्रधान की हत्या प्रधानी चुनाव की रंजिस में किया गया। आइए देखते हैं कि दैनिक जागरण ने क्या लिखा है--


अब दूसरी तरफ इसी अखबार का पक्षपाती रुख देखते हैं जो उसने अपने संपादक की में लिखा है--
हसवा नेहा पर पूर्ण प्रधान सुरेंद्र सिंह को भाजपा का कार्यकर्ता बताते हुए उसकी बड़ाई में तमाम चार चांद लगाए हैं। इसी मामले को गांधी जी के गांधीवाद से तुलना कर दिया गया है। इतना में तमाम तरीके के सवाल उठाए गए हैं। बजाय कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने के गांधीवाद को दोषी बनाया गया है। और देखे क्या और कैसा लिखा गया है--


अजब हम अपने सामने एक ही तारीख में एक ही समस्या का बराबर प्रहार किया जाना और एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में समाचार का रखा जाना अच्छा नहीं लग रहा है। समाचार में साफ उसने कहा है कि पूर्व प्रधान सुरेंद्र सिंह का मर्डर पूर्व की प्रधानी की रंजिश में किया गया है यानि अब इसमें कुछ ढूंढने और समझने लायक नहीं बचा है। यह सच भी है कि प्रधानी के समय से ही आपस में रंजिश चला करती है कोई इस पार्टी में शामिल हो जाता है तो दूसरा उसकी विपक्ष की पार्टी में शामिल हो जाता है। यही सुबह हो जाता है एक दूसरे को नीचा दिखाने का काम । जाहिद सी बात है कि जीता हुआ व्यक्ति जरूर-जरूर अपने सामने वाले विपक्षी को तमाम प्रकार से पताणित करने की कोशिश करेगा। इसी कोशिश में रंजिश पति आती है और एक दूसरे पर जानलेवा हमला करने लगते हैं।

अखबार अपने संपादकीय में समाचार छपने के बाद भी यह तय नहीं कर पाए कि प्रधान की मौत किस कारण हुई है। जबकि पुलिस के रिपोर्ट में साफ है कि अभी तक जो सामने आया है उसके अनुसार प्रधानी के चुनाव की रंजिश है। आज गांधीवाद के सवाल उठाने वाले इस अखबार ने यह नहीं कहा कि गोडसे ले गांधीजी की सरेआम जान ले ली थी। तब या तो यह अख़बार था नहीं या फिर यह लोग जानबूझकर के जनता में एक अलग झूठा और गलत तरह के मुद्दे को जिंदा करना चाहते हैं।

इस संपादक को यह देखना चाहिए कि हत्या इंसान की होती है। इसमें न तो गांधीवाद की होती है, न ही गोडसे वाद की होती है। यहां साफ जाहिर है कि मरता केवल इंसान है और मारने वाले भी होते तो इंसान है लेकिन उनमें इंसानियत नहीं रह जाती है। मैं अपने विद्वान संपादक और विद्वान संवाददाताओं से यह प्राथना करूंगा और यह चाहूंगा कि आप अपनी विश्वनीयता काम करने के लिए, अपने आपको इस राजनीति के चक्कर से अलग रखते हुए अच्छे प्रयास करें।

///// विनोद सचान /////

आनलाइन भ्रष्टाचार-रेलवे R.P.F.

आनलाइन भ्रष्टाचार--- रेलवे ऑनलाइन खरीदारी के तर्ज पर ऑनलाइन रिश्वत का भी मामला आज प्रकाशित हुआ है। विदित हो कि राजधानी एक्सप्रेस में आरप...